Sunday, March 22, 2026

हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य

हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य
रणबीर सिंह दहिया
                  
       हरियाणा एक कृषि प्रधान प्रदेश के रूप में जाना जाता है । राज्य के समृद्ध और सुरक्षा के माहौल में यहाँ के किसान और मजदूर , महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों , नए उपकरणों , नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढाया , जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में सम्पन्नता आई मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका ।
   राज्य में 7,356 गाँव हैं, जिनमें से 6,222 में ग्राम पंचायतें हैं।
    हरियाणा के शहरीकरण के प्रमुख पहलू उच्च शहरीकरण स्तर:  2011 की जनगणना के अनुसार, हरियाणा की शहरी आबादी 34.88% थी, जो राष्ट्रीय औसत 31.16% से अधिक थी। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि शहरी आबादी 43.26% है।  तीव्र वृद्धि:  शहरी जनसंख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, 1901 में 5.7 लाख से बढ़कर 2011 में 88.2 लाख हो गई। शहरी जनसंख्या वृद्धि दर भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
      सर्वाधिक शहरीकृत: फरीदाबाद सबसे अधिक शहरीकृत जिला है, इसकी 79.51% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। गुरुग्राम, पंचकुला और पानीपत भी सबसे अधिक शहरीकृत हैं।  सबसे कम शहरीकृत: मेवात सबसे कम शहरीकृत जिला है।  परिणाम और चुनौतियाँ: बुनियादी ढांचे पर दबाव: तेजी से जनसंख्या वृद्धि आवास, परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसे मौजूदा बुनियादी ढांचे पर दबाव डालती है।  पर्यावरणीय प्रभाव: बढ़ती यातायात भीड़ और प्रदूषण महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
     2014-15 में हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 1,47,382 रुपये थी.
2024-25 में अनुमानित प्रति व्यक्ति आय 3,53,182 रुपये है.
यह अनुमान लगाया गया है कि हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 2014-15 से 2024-25 के बीच औसतन 9.1% की वार्षिक दर से बढ़ी है.
2014-2015 में हरियाणा का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) 4,37,145 करोड़ रुपये था, जबकि 2024-25 में अनुमानित GSDP 12,13,951 करोड़ रुपये है. 
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह अनुमानित आंकड़े हैं और वास्तविक आंकड़े भिन्न हो सकते हैं।
       यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ा रहा है । ऐसा क्यों हुआ ? यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस कि मांग करता है । हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्ही संपन्न तबकों का गलबा रहा है । यहाँ के काफी लोग फ़ौज में गए और आज भी हैं मगर उनका हरियाणा में क्या योगदान रहा इसपर ज्यादा ध्यान नहीं गया है । उनकी एक भूमिका रही है। 
इसी प्रकार देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया ; इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है । क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों कि संस्कृति है? क्या हरियाणवी डायलैक्ट एक भाषा का रूप ले  सकता है ? महिला विरोधी, दलित विरोधी तथा प्रगति विरोधी तत्वों को यदि हरियाणवी संस्कृति से बाहर कर दिया जाये तो हरियाणवी संस्कृति में स्वस्थ पक्ष क्या बचता है ? इस पर समीक्षात्मक रुख अपना कर इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता है । क्या पिछले दस पन्दरा सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं ? व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सारी सफलताएँ हांसिल की हैं ।
    समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों ,सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है । इसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुँच सका है ।
        हमारे हरियाणा के गाँव में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति , गाँव की परंपरा , गाँव की इज्जत व शान के नाम पर बहुत छल प्रपंच रचे गए हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय कि बजाय बहुत ही अन्याय पूर्ण व्यवहार किये जाते रहे हैं ।उदाहरण के लिए हरियाणा के गाँव में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब (जोहड़) कि खुदाई का काम होता तो पूरा गाँव मिलकर इसको करता था । रिवाज यह रहा है कि गाँव की हर देहल से एक आदमी तालाब कि खुदाई के लिए जायेगा । पहले हरियाणा के गावों क़ी जीविका पशुओं पर आधारित ज्यादा रही है। गाँव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे । इन पशुओं का जीवन गाँव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था । गाँव क़ी बड़ी आबादी के पास न ज़मीन होती थी न पशु होते थे । अब ऐसे हालत में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं, वह भी अपनी देहल से एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना ज़मीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था । वाह कितनी गौरवशाली और न्यायपूर्ण परंपरा थी हमारी? यह तो महज एक उदाहरण है परंपरा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का ।
             महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रीति रिवाज , हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएँ आज भी मौजूद हैं । इनमें मौजूद दुभांत को देख पाने क़ी दृष्टि अभी विकसित होना बाकी है | लड़का पैदा होने पर लडडू बाँटना मगर लड़की के पैदा होने पर मातम मनाना , लड़की होने पर जच्चा को एक धड़ी घी और लड़का होने पर दो धड़ी घी देना, लड़के क़ी छठ मनाना, लड़के का नाम करण संस्कार करना, शमशान घाट में औरत को जाने क़ी मनाही , घूँघट करना , यहाँ तक कि गाँव कि चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता व अन्याय पर टिके हुए हैं । सामंती पिछड़ेपन व सरमायेदारी बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया । मगर पढ़े लिखे हरियाणवी भी इनका निर्वाह करके बहुत फखर महसूस करते हैं । यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है । हरियाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध , दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीद के लाना और उनका यौन शोषण  आदि का चलन बढ़ रहा है । सती, बाल विवाह ,अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आन्दोलन नहीं चला । स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर को- एजुकेसन का विरोध किया गया , स्त्रियों कि सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरियाणा में अनदेखी की गयी । उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा जबकि इसमें उसका कानूनी हक़ है । चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है । दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृति चारों तरफ देखी जा सकती है । यहाँ समाज के बड़े हिस्से में अन्धविश्वास , भाग्यवाद , छुआछूत , पुनर्जन्मवाद , मूर्तिपूजा , परलोकवाद , पारिवारिक दुश्मनियां , झूठी आन-बाण के मसले, असमानता , पलायनवाद , जिसकी लाठी उसकी भैंस , मूछों के खामखा के सवाल , परिवारवाद ,परजीविता ,तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है । ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं । हरियाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के  वर्ग के रूप में हुआ ।
             तथाकथित स्वयम्भू पंचायतें नागरिक के अधिकारों का हनन करती रही हैं और महिला विरोधी व दलित विरोधी तुगलकी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती रहती हैं । राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं या चोर दरवाजे से इन पंचातियों की मदद करते रहते हैं । यह अधखबड़ा मध्यम वर्ग भी कमोबेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है । एक दौर में हरयाणा में सर्व खाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत ,संस्कृति ,मर्यादा आदि के नाम पर महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई  और अपना सामाजिक वर्चस्व बरक़रार रखने के लिए जहाँ एक ओर ये जातिवादी पंचायतें घूँघट ,मार पिटाई ,शराब,नशा ,लिंग पार्थक्य ,जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं वहीँ दूसरी ओर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर युवा लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह तरह के फतवे जारी करती रही हैं । जौन्धी और नयाबांस की घटनाएँ तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किये गए तालिबानी फैंसले जीते जागते उदाहरण हैं । युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन-हिंसा और दहेज़ हत्या की शिकार हों रही हैं । ये पंचायतें बड़ी बेशर्मी से बदमाशी करने वालों को बचाने की कोशिश करती हैं । अब गाँव की गाँव, गोत्र की गोत्र और सीम के लगते गाँव के भाईचारे की गुहार लगाते हुए हिन्दू विवाह कानून 1955  में संसोधन की बातें की जा रही हैं , धमकियाँ दी जा रही हैं और जुर्माने किये जा रहे हैं। हरियाणा के रीति रिवाजों की जहाँ एक तरफ दुहाई देकर संशोधन की मांग उठाई जा रही है, वहीँ हरियाणा की ज्यादतर आबादी के रीति रिवाजों की अनदेखी भी की जा रही है ।  
            हरियाणा में  खाते-पीते मध्य वर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबक़ों का इसे समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है, जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां, दलित, अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्ष से अलग रहें। लेकिन साधारण जनता अगर फ़ासीवादी मुहिम में शरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता , अकेलेपन, हताशा अन्धसंशय, अवरुद्ध चेतना, पूर्वग्रहों, भ्रम द्वारा जनित भावनाओं के कारण शरीक होती है। फ़ासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित और उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुषिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी से पनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिए कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतंत्र को बरता है, उससे कहीं ज़्यादा फ़ासीवादी परिस्थितियों में रहने का अभ्यास किया है।` 

           गाँव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोतरी हो रही है । समुदाय , जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलों को पीट पीट कर मार डाला जाता है , उनकी हत्या कर दी जाति है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है । एक तरफ तो महिला के साथ वैसे ही इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हों , वहीँ उसे समुदाय की 'इज्जत' मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है । अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है ।
           यहाँ के प्रसिद्ध संगियों हरदेवा , लख्मीचंद ,बाजे भगत , दयाचंद मायना , मेहर सिंह ,मांगेराम ,चंदरबादी, धनपत व खेमचंद  की रचनाएं काफी प्रसिद्ध हुई हैं। रागनी कम्पीटिसनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है । ऑडियो कैसेटों की जगह सीडी लेती गई और अब यु ट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है। स्वस्थ ,जन पक्षीय सामग्री के साथ ही पुनरुत्थानवादी व अंधउपभोग्तवादी मूल्यों की सामग्री भी नजर आती है । हरियाणा के लोकगीतों पर  समीक्षातमक काम कम हुआ है । महिलाओं के दुःख दर्द का चित्रण काफी है । हमारे त्योहारों के अवसर के बेहतर गीतों की बानगी भी मिल जाती है ।
        गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात गोत्र व धर्म के ऊपर लड़वा कर हमारी इंसानियत के जज्बे को , हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है । गऊ हत्या या गौ-रक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है । दुलिना हत्या कांड और अलेवा कांड गौ के नाम पर फैलाये जा रहे जहर का ही परिणाम थे। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं । राधास्वामी और दूसरे सैक्टों का उभार भी देखने को मिलता है ।
         सांस्कृतिक स्तर पर हरयाणा के चार पाँच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं । हरेक गाँव में भी अलग अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं । एक गांव में कई गांव बस्ते हैं। जातीय भेदभाव एक ढंग से कम हुए हैं मगर अभी भी गहरी जड़ें जमाये हैं । आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं । सभी पहले के सामाजिक व नैतिक बंधन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं ।  मगर जनतांत्रिक मूल्यों के विकास की बजाय बाजारीकरण की संस्कृति के मान मूल्य बढ़ते जा रहे हैं । बेरोजगारी बेहताशा बढ़ी है । मजदूरी के मौके भी कम से कमतर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीडन भी बढ़ा है । दलितों से भेदभाव बढ़ा है वहीँ उनका असर्सन भी बढ़ा है । कुँए अभी भी कहीं कहीं अलग अलग हैं । परिवार के पितृसतात्मक ढांचे में परतंत्रता बहुत ही तीखी हो रही है । पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं मगर इनकी जगह जनतांत्रिक ढांचों का विकास नहीं हो रहा । तल्लाकों के केसिज की संख्या कचहरियों में बढ़ती जा रही है । इन सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है । मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट की गिरफ्त में है । खेत मजदूरों ,भठ्ठा मजदूरों ,दिहाड़ी मजदूरों व माईग्रेटिड मजदूरों का जीवन संकट गहराया है । लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है ।
                      कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है । तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है । ज़मीन की दो -ढाई एकड़ जोत पर 70 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है | ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। थ्रेशर और हार्वेस्टर कम्बाईन ने मजदूरी के संकट को बढाया है।सामलात जमीनें खत्म सी हों रही हैं । कब्जे कर लिए गए या आपस में जमीन वालों ने बाँट ली । अन्न की फसलों का संकट है । पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है । नए बीज ,नए उपकरण , रासायनिक खाद व कीट नाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलंदाजी ने इस सीमान्त किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है । प्रति एकड़ फसलों की पैदावार घटी है जबकि इनपुट्स की कीमतें बहुत बढ़ी हैं । किसान का कर्ज भी बढ़ा है । स्थाई हालातों से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर तेजी से बढ़ रहा है । अन्याय व अत्याचार बेइन्तहा बढ़ रहे हैं । किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैंठ गयी और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन , ताश खेल कर बिताने की प्रवर्ति बढ़ी है । हाथ से काम करके खाने की प्रवर्ति का पतन हुआ है । साथ ही साथ दारू व सुल्फे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थों की खपत बढ़ी है ।
     पिछले दिनों एक साल तक चले किसान आंदोलन ने एक बार किसानी एकता को मजबूत करने का काम किया है। लेकिन किसानी संकट बढ़ता ही नजर आ रहा है। मध्यम वर्ग के एक हिस्से के बच्चों ने अपनी मेहनत के दम पर सॉफ्ट वेयर आदि के क्षेत्र में काफी सफलताएँ भी हांसिल की हैं । मगर एक बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है । कई जनतांत्रिक संगठन इस बेचैनी को सही दिशा देकर जनता के जनतंत्र की लडाई को आगे बढ़ाने में प्रयास रत दिखाई देते हैं । अब सरकारी समर्थन का ताना बाना टूट गया है और हरियाणा में कृषि का ढांचा बैठता जा रहा है । इस ढांचे को बचाने के नाम पर जो नई कृषि नीति या नितियां परोसी जा रही हैं उसके पूरी तरह लागू होने के बाद आने वाले वक्त में ग्रामीण आमदनी ,रोजगार और खाद्य सुरक्षा की हालत बहुत भयानक रूप धारण करने जा रही है। साथ ही साथ बड़े हिस्से का उत्पीडन भी सीमायें लांघता जा रहा है, साथ ही इनकी दरिद्र्ता बढ़ती जा रही है । नौजवान सल्फास की गोलियां खाकर या फांसी लगाकर आत्म हत्या को मजबूर हैं ।
                 गाँव के स्तर पर एक खास बात और पिछले कुछ सालों में उभरी है , वह यह कि कुछ लोगों के प्रिविलेज बढ़ रहे हैं । इस नव धनाड्य वर्ग का गाँव के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पर गलबा है । पिछले सालों के बदलाव के साथ आई छद्म सम्पन्नता , सुख भ्रान्ति और नए उभरे सम्पन्न तबकों --परजीवियों ,मुफतखोरों और कमीशन खोरों -- में गुलछर्रे उड़ाने की अय्यास कुसंस्कृति तेजी से उभरी है । नई नई कारें ,कैसिनो ,पोर्नोग्राफी ,नँगी फ़िल्में ,घटिया केसैटें , हरयाणवी पॉप ,साइबर सैक्स ,नशा व फुकरापंथी,  ,कथा वाचकों के प्रवचन ,झूठी हैसियत का दिखावा इन तबकों की सांस्कृतिक दरिद्र्ता को दूर करने के लिए अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। जातिवाद व साम्प्रदायिक विद्वेष ,युद्ध का उन्माद और स्त्री द्रोह के लतीफे चुटकलों से भरे हास्य कवि सम्मलेन बड़े उभार पर हैं । इन नव धनिकों की आध्यात्मिक कंगाली नए नए बाबाओं और रंग बिरंगे कथा वाचकों को खींच लाई है । विडम्बना है कि तबाह हो रहे तबके भी कुसंस्कृति के इस अंध उपभोगतावाद से छद्म ताकत पा रहे हैं ।
                     दूसर तरफ यदि गौर करेँ तो सेवा क्षेत्र में छंटनी और अशुरक्षा का आम माहौल बनता जा रहा है। इसके बावजूद कि विकास दर ठीक बताई जा रही है , कई हजार कर्मचारियों के सिर पर छंटनी कि तलवार चल चुकी है और बाकी कई हजारों के सिर पर लटक रही है । सैंकड़ों फैक्टरियां बंद हों चुकी हैं । बहुत से कारखाने यहाँ से पलायन कर गए हैं । छोटे छोटे कारोबार चौपट हों रहे हैं । संगठित क्षेत्र सिकुड़ता और पिछड़ता जा रहा है । असंगठित क्षेत्र का तेजी से विस्तार हों रहा है । फरीदाबाद उजड़ने कि राह पर है , सोनीपत सिसक रहा है , पानीपत का हथकरघा उद्योग गहरे संकट में है । यमुना नगर का बर्तन उद्योग चर्चा में नहीं है ,सिरसा ,हांसी व रोहतक की धागा मिलें बंद हों गयी हैं । धारूहेड़ा में भी स्थिलता साफ दिखाई देती है ।
                शिक्षा के क्षेत्र में बाजार व्यवस्था का लालची व दुष्टकारी खेल सबके सामने अब आना शुरू हो गया है । सार्वजनिक क्षेत्र में साठ साल में खड़े किये ढांचों को या तो ध्वस्त किया जा रहा है या फिर कोडियों के दाम बेचा जा रहा है । शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर खिसकती जा रही है । शिक्षा के क्षेत्र में जहां एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किए जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों का खोलना एक अचीवमेंट के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूल की शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा  को व्यापार बना दिया गया है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो ,चाहे वह उच्च शिक्षा हो, चाहे वह विश्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो, हरेक क्षेत्र में व्यापारी करण और पैसे के दम पर डिग्रियों का कारोबार बढ़ा है। दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियाओं की बाढ़ सी ला दी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढाया तो बिल्कुल भी नहीं है घटाया बेशक हो। इंस्टिट्यूट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारत खड़ी करके , मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्यप्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है। विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियां में यूजीसी की गाइडलाइन्स की धज्जियां उड़ाई जाती रही हैं और उड़ाई जा रही हैं  । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह संभव है। 

          स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल हुआ  है । गरीब मरीज के लिए सभी तरफ से दरवाजे बंद होते जा रहे हैं । लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीनें बेचनी पड़ रही हैं । आरोग्य कोष या राष्ट्रिय बीमा योजनाएं ऊँट के मुंह  में जीरे के समान हैं । उसमें भी कई सवाल उठ रहे हैं । स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की दखलअंदाजी बढ़ी है । एंपैनलमेंट का कारोबार खूब चल रहा है । सरकार की स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी, डॉक्टरों की कमी, कहीं कुछ और कमियों के चलते घिसट रही हैं। गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एग्जीक्यूशन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं। प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरियाणा में लागू नहीं किया है, इसलिए कई प्राइवेट नर्सिंग होम की लूट दिनोंदिन अमानवीय रूप धारण करती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटल में सीटी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती हैं । मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज योजना सैद्धांतिक तौर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी उसकी एग्जीक्यूशन बहुत धीरे चल रही है। इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटियों का प्रावधान नहीं रखा गया है। खून की कमी nfhs 4 के मुकाबले nfhs 5 में   गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है। इसी प्रकार कुपोषण बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज महंगा होता जा रहा है।

               अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाये । यह महानगरों तक नहीं सिमित रहा । अब तो शहर शहर , गली गली में मैकडोनाल्ड हमारे बच्चों को बर्गर ,पिज्जा फ्री के उपहार दे कर खाने की आदत डालेगा , रिझाएगा , फँसाएगा ताकि कल को वह पूरी , परांठा , इडली , डोसा भूल जाये और बर्गर ओइज्ज के बगैर रह ही नहीं पाए । आखिर बच्चे ही तो कल का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे भारत देश में । पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति , कारीगरी, हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो । इसी प्रकार आज बाजार के लिए देश प्रदेश विशेष के हुनर , कारीगरी, व्यवसाय ,शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोल जा रहा है और हमारे मीडिया इस मामले में मल्टीनेसनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं । हरियाणा में अब गुनध्धा हुआ आट्टा , अंकुरित मूंग, चना आदि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगी । कूकीज , चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे । जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे । भारतीय कुटीर ऊद्योग के साथ साथ अन्य कम्पनियाँ भी मल्टीनेसनल के पेट में चली जायेंगी ।
सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है ? यदि नहीं तो इसके ठीक उल्ट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके नयायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है । उस विचार से नजदीक का सम्बन्ध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं । इसके बनाने के सब साधन इसी दुनिया में इसी हरियाणा में मौजूद हैं । जरूरत है उस नजर को विक्सित करने की । आज मानवता के वजूद को खतरा है । यह इस विचारधारा का या उस विचारधारा का मसला नहीं है । यह एक देश का सवाल नहीं है यह एक प्रदेश का सवाल नहीं है यह पूरी दुनिया का सवाल है । जिस रास्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रास्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है । हरियाणा के विकास मॉडल में भी यह साफ़ प्रकट हो रहा है । नव वैश्वीकरण की प्रक्रिया से विनाश ही होगा विकास नहीं । 

मगर अब दुनिया यह सब समझ रही है ।  हरियाणा वासी भी समझ रहे हैं । मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाडी के नीचे नहीं रखेगी । मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असंभव कर देगी । हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं । युवा लड़के लड़कियां, दलित, और महिलाएं इसके अगवा दस्ते होंगे और समाज सुधर का काम अपनी प्रगतिशील दिशा अवश्य पकड़ेगा।
आज के हरयाणा की चुनौतियां
हरयाणा प्रदेश ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2026 तक पहुंचा है । इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं । इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है । पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था इसके बनने के वक्त । उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत रंग ले कर आई जिसने सड़कों का जाल बिछाया, बिजली गावों गावों तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखि जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया ।
नए बीज, नए उपकरण, नयी खाद , नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के एक हिस्से में हरित क्रांति ने क्षेत्र की खेती की पैदावार को बढ़ाया । वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती जा रही है । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं । हरित क्रांति से एक धनाढय़ वर्ग पैदा हुआ जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ की राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे इंसान का विकास किया है जो कुछ बातों में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । इसके व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है ,चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो, चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो । इस अधखबडे व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक है और एक नवजागरण आंदोलन की अपेक्षा है। शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों  का खोलना एक अचीवमैंट के रूप में पेश किया जा रहा है वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विश्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो, हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रीयों का कारोबार बढ़ा है । दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियायों की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं हाँ घटाया बेशक हो । इंस्टीच्युट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारतें खड़ी करके मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्य प्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है । विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियों में यू जी सी की गाइड लाइन्स की धजियां उड़ाई जाती रही हैं । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह सम्भव है और समय इसकी मांग करता है ।
       स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सैक्टर की दखलंदाजी बढ़ी है । एम्पैनलमेंट का कारोबार खूब चल रहा है । सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी , डाक्टरों की कमी ,कहीं कुछ और कमियों के चलते ,घिसट रही हैं । गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एक्जीक्यूसन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं । प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरयाणा में लागू नहीं किया है । इसलिए प्राइवेट नर्सिंग होम्ज की लूट दिनोदिन आमनवीय रूप अख्तियार करते हुए बढ़ती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटलज में सी टी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती हैं । मुख्य मंत्री मुफ्ती इलाज योजना सैद्धांतिक तोर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी इसकी एक्जीक्यूसन बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी सर्वे दो के मुकाबले सर्वे तीन में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।
सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप से सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । कुछ भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी से हो रहा है । सकारात्मक अजेंडा न होने के कारण आज युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे, फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफत में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के , महिला उत्पीड़न के केसिज बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है । असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है , पुरुष है, प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है । एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित  तबकों  द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है । दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद में गरीब किसान, मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की , प्रवाशी मजदूर , माइग्रेटेड पापुलेशन , असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरयाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।
नैशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी पी में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरयाणा का सवरूप क्या होगा ? इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी ? नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ? जेंडर फ्रैंडली , ईको फ्रैंडली और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरयाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव अजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस अजेंडे पर अपनी पोजीसन रखने को कहा जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीति के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।
इन चुनौतियों से निपटने निपटने के लिए हरियाणा सरकार भविष्योन्मुखी नीतियां बनाने और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विभिन्न योजनाएं लागू करने पर गंभीरता से जोर देने की अपेक्षा है।, सिर्फ आर्थिक सर्वेक्षणों और सरकारी घोषणाओं से काम नहीं चलने वाला। ठोस जमीनी हस्तक्षेप की जरूरत है।
रणबीर सिंह दहिया
रिटायर्ड सीनियर प्रोफेसर , 
सर्जरी विभाग, पीजीआईएमएस रोहतक।

ग्रामीण संसार

Friday, March 20, 2026

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हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति, हरियाणा।
11वां त्रिवार्षिक राज्य स्तरीय प्रतिनिधि सम्मेलन
दिनांक: 11-13 अप्रैल, 2026, स्थान: महाराणा प्रताप भवन, सेक्टर 8, करनाल
.............................द्वार ...................................हाल ........................................... नगर
प्रस्तावित रिपोर्ट
आदरणीय साथियांे, 

हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति के 11वें राज्य सम्मेलन के मौके पर आप सभी मेहमानों, प्रतिनिधियों और सहयोगियों का हार्दिक अभिनन्दन है। हमारा गत राज्य सम्मेलन 09-10 अप्रैल 2023 को रोहतक में भारी उत्साह के साथ संपन्न हुआ था। जिसके खुले सत्र में 160 प्रतिनिधियों समेत करीब 400 साथियों ने भाग लिया था। सम्मेलन में 9 सदस्यीय सचिवमण्डल समेत 26 सदस्यीय राज्य कार्यकारिणी का गठन किया गया था। गत सम्मेलन से अब तक की अवधि में देश-प्रदेश और दूनिया में बहुत ही तेज गति से सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक बदलाव हुए हैं। जिनका नोटिस लेकर ही हम अपनी भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं। फिलहाल देश-प्रदेश में सांप्रदायिक एवं विभाजनकारी शक्तियां अति सक्रिय हैं और सत्ता पर काबिज हैं; जो जनता को असल सवालों से भटकाकर जाति, धर्म व इलाके आदि के नाम पर आपस में बांटने का काम रणनीतिक तरीके से कर रही हैं। इन हालातों में सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के लिए सहजता से काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में परिस्थितियों की ठोस समीक्षा करते हुए ही हमें भविष्य की रणनीति तय करने के लिए ज्ञान-विज्ञान आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य को जानना व समझना जरूरी है।
सांगठनिक रिपोर्ट
हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति के गत राज्य सम्मेलन की समीक्षा हमने पहली ही बैठक कर ली थी। जिसमें आज के दौर में बढ़ रहे तनाव और दबाव के बीच ज्ञान-विज्ञान आंदोलन के सामने दुनिया की मुख्य चुनौतियों, जिनमें संसाधनों का असमान वितरण और जनतंत्र की मांग को कुचलने की प्रवृत्ति आदि को गहराई से समझते हुए आगे बढ़ने का आह्वान किया गया था। राष्ट्रीय केंद्र से आए मुख्य वक्ता प्रोबीर पुरूस्कायत तथा आशा मिश्रा और काशीनाथ चटर्जी के वक्तव्य भी काफी अच्छे रहे थे। हमारे विभिन्न सहयोगी संगठनों हरियाणा विज्ञान मंच, भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, जतन नाट्य मंच, हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ, सर्व कर्मचारी संघ, जनवादी लेखक संघ हरियाणा, जनवादी महिला समिति, डीवाईएफआई, दलित अधिकार मंच और विकलांग अधिकार मंच आदि संगठनों से भी नेटवर्किंग बेहतर थी।

गत 3 वर्षों में हमने सामाजिक हस्तक्षेप के लिए कारगर संगठन का निर्माण करने की अनिवार्यता को समझते हुए हर स्तर पर सांगठनिक प्रक्रियाओं को दुरूस्त करने, कामों का उचित बंटवारा करने, अलग-अलग क्षेत्रों के विमर्श के लिए गठित 10 कोर समूहों को सक्रिय कर सामूहिक पहल करने की कार्य-पद्धति विकसित करने और संगठन की सदस्यता करने के कामों को गंभीरता से लेने का प्रयास किया हैं। वैज्ञानिक मानसिकता का विकास, सामाजिक न्याय, महिलाओं, दलितों एवं युवाओं की स्थिति, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र जैसे कार्यों पर विमर्श की प्रक्रियाएं निरन्तरता में संचालित की गई हैं। पूरे सांगठनिक ढ़ांचे को सक्रिय बनाने के लिए एक निश्चित अंतराल पर सचिवमण्डल, कार्यकारिणी और कोर समूहों की लगातार आवश्यकता अनुसार बैठकें आयोजित की गई। लेकिन अभी हम वैचारिक कार्यों को एक स्तर तक और सीमित रूप में ही कर पा रहे हैं। जबकि हमें मानव जीवन के तमाम मसलों और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए वैचारिक कार्य को अधिक गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

जिला प्रभारियों और कोर ग्रुपों के इंचार्ज के तौर पर सचिवमण्डल एवं राज्य कमेटी के अधिकतर सदस्यों की व्यक्तिगत जिम्मेवारियों को निभाने के प्रयासों की गंभीरता कमजोर बनी हुई है। हालांकि कुछ जिलों की मीटिंगें हुई हैं लेकिन वो भी निरन्रता में नहीं हो पा रही हैं। जिला प्रभारियों से आपसी तालमेल का भारी अभाव बना हुआ है और प्रभारी भी पहलकदमी करके संज्ञान नहीं ले पा रहे हैं। जिससे एक खास स्पिरिट नहीं बन पा रही है। बदलती परिस्थितियों के मध्यनजर दिनांक 10/03/2024 कुछ नए साथियों को राज्य कार्यकारिणी में आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया गया। जींद के जिला सचिव मा0 प्रमोद कुमार, करनाल के जिला उपाध्यक्ष विनोद मंगलौरा और फतेहाबाद के जिला संयोजक संदीप महिया शामिल हैं। साथ ही वर्तमान सांगठनिक जिलों के साथ ही फतेहाबाद, कुरुक्षेत्र, सोनीपत, झज्जर और गुरुग्राम आदि जिलों में भी सांगठनिक प्रयास बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। जहां राज्य सचिवमण्डल एवं कार्यकारिणी सदस्य अपनी सक्रियता बढ़ाते हुए काम करेंगे।

मीटिंगों की संचालन व्यवस्था: मीटिंगों की संचालन व्यवस्था को काफी हद सुचारू किया गया है। जहां हर माह राज्य सचिवमण्डल और दो माह में राज्य कार्यकारिणी की बैठकें करने का प्रयास सफल रहा है; वही जिलों की मीटिंगों में भी शामिल होने का यथासंभव प्रयास रहता है। हर तरह की मीटिंगों का सरकुलर जारी किया जाता है ताकि अनुपस्थित साथियों को भी मीटिंग के विमर्श और निर्णयों की जानकारी मिल सके। इसके साथ ही बीच-बीच में जरूरी निर्णयों को अवगत कराने के लिए भी वाटसएप पर सूचनाएं साझा करने का प्रयास रहता है।

मीटिंगों में उपस्थिति का रिकाॅर्ड:
गत सम्मेलन से अब तक राज्य सचिवमण्डल की 23 और कार्यकारिणी 20 मीटिंगें हुई हैं। जिनमें उपस्थिति का रिकाॅर्ड एवं टिप्पणियां इस प्रकार है:
 
क्र0 पदनाम नाम उपस्थिति (म्ब् उममज.20) उपस्थिति (ैमबज उममज.23) टिप्पणी
1 अध्यक्ष प्रमोद गौरी 20 23
2 सचिव सुरेश कुमार 20 23
3 कोषाध्यक्ष नन्दकिशोर 10 10
4 उपाध्यक्ष डॉ0 धर्म सिंह 1 1 केवल मात्र एक मीटिंग एटैण्ड की गई। बाद में 6 माह की छुट्टी ली मगर बाद में तो दुबारा आने से ही इंकार कर दिया।
5 उपाध्यक्ष सोहन दास 16 21
6 सहसचिव नरेश प्रेरणा 8 9 अप्रैल 24 तक हुई सैक्ट की 6 मीटिंगों में से सभी 6 में और वर्ष 2025 में हुई 10 मीटिंगों में से 6 में गैरहाजिरी रही। यानि 3 वर्षों में से करीब 2 वर्ष गैरहाजिरी रही। ऐसी ही स्थिति म्ब् मीटिंगों की रही।
7 सहसचिव राममेहर 9 12 बीच-बीच में अन्य प्रोजैक्टों में काम करने के चलते कुछ अनुपस्थिति रही।
8 सेक्ट मैंबर मनीषा 19 23
9 सेक्ट मैंबर वेदपाल 19 19
10 सेक्ट मैंबर मा. रमेश चन्द्र 13 16/2 16 मीटिंगों में से केवल मात्र 2 मीटिंग एटैण्ड की गई।
11 म्ब् सदस्य डॉ0 दहिया 19
12 म्ब् सदस्य वेदप्रिय 11 साईंस कोर को सबसे ज्याद सक्रिय रखने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि शारीरिक स्वास्थ्य की समस्या के चलते हाजिरी कम रही।
13 म्ब् सदस्य अनिता शर्मा 8 स्वास्थ्य एवं घरेलू कारणों से कम हाजिरी रही।
14 म्ब् सदस्य सतबीर नागल 17
15 म्ब् सदस्य शीशपाल 12 अन्य सांगठनिक जिम्मेदारियों के चलते हाजिरी कम रही।
16 म्ब् सदस्य अमृतलाल 12 स्वास्थ्य कारणों एवं अन्य साथियों के न चलने के कारण कम हाजिरी रही।
17 म्ब् सदस्य डा. बलजीत भ्याण 8 घरेलू कारणों एवं अन्य साथियों के न चलने के कारण कम हाजिरी रही।
18 म्ब् सदस्य मा0 वजीर सिंह 9 अन्य सांगठनिक जिम्मेदारियों के चलते हाजिरी कम रही।
19 म्ब् सदस्य मा0 रामफल 9 घरेलू कारणों एवं अन्य व्यस्तताओं के कारण कम हाजिरी रही।
20 म्ब् सदस्य सतीश चैहान 3 सांगठनिक समस्याओं के चलते कम उपस्थिति रही।
21 म्ब् सदस्य अनिता बगोटिया 16
22 म्ब् सदस्य सुलेख चन्द 4 मीटिंगों में आने के प्रति कम गंभीरता दिखाई।
23 म्ब् सदस्य शीतल 10 घरेलू कारणों एवं अन्य व्यस्तताओं के कारण कम हाजिरी रही।
24 म्ब् सदस्य सतपाल आनंद 1 ज्यादातर समय विदेश में रहने और अन्य जिम्मेदारियों के चलते कम हाजिरी रही।
25 म्ब् सदस्य मदनपाल 1 स्वास्थ्य कारणों से एक मीटिंग के बाद आने से इंकार कर दिया।
26 म्ब् सदस्य राजबाला 1 घरेलू कारणों से एक मीटिंग के बाद आने से इंकार कर दिया।
27 म्ब् सदस्य मा. प्रमोद कुमार 15/10
28 म्ब् सदस्य मा. संदीप महिया 15/5 स्कूल में छुटटी न मिलने के कारण हाजिरी कम रही।
29 म्ब् सदस्य विनोद मंगलोरा 15/4 घरेलू कार्यों एवं अन्य व्यस्तताओं के कारण कम हाजिरी रही।

सांगठनिक जिम्मेदारियों का विभाजन:
राज्य सचिवमण्डल एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यों की ठोस जिम्मेदारी तय की गई। सचिवमण्डल सदस्यों को सांगठनिक जिलों का प्रभारी कार्यकारिणी सदस्यों को पड़ोसी जिलों में संपर्क बढ़ाकर काम की शुरूआत की गई। इसके अलावा 10 कोर समूहों का पुनर्गठन कर अलग-अलग मुद्दों पर गहराई से विमर्श की प्रक्रियाएं चलाई गई। सभी कोर समूहों में राज्याध्यक्ष और राज्य सचिव शामिल रहें। 

सचिवमण्डल सदस्यों की व्यक्तिगत जिम्मेदारियां: 
1. प्रमोद गौरी: राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय काॅ-आर्डीनेशन;
2. सुरेश कुमार: ओवरआॅल काॅ-आर्डीनेशन, प्रोसीडिंग एवं पैस नोट आदि;
3. नंदकिशोर: वित्तिय लेखा-जोखा एवं जिलों से लेनदेन;
4. सोहन दास: सदस्यता का फाॅलोअप व कंसोलीडेशन;
5. राममेहर: प्रैस नोट आदि;
6. मनीषा: बुलेटिन व अन्य प्रकाशन;
7. वेदपाल: सभी प्रकाशनों का वितरण व जिलों से तालमेल। 

सचिवमण्डल सदस्यों की जिला प्रभारियों के तौर जिम्मेदारियां:
1. कैथल - सुरेश कुमार
2. करनाल - सोहन दास
3. पानीपत - राममेहर
4. जींद - नरेश प्रेरणा
5. भिवानी - डॉ0 धर्म सिंह
6. हिसार - नन्दकिशोर
7. रोहतक - प्रमोद गौरी
नोट: सचिवमण्डल के अन्य दो साथियों मनीषा और वेदपाल की विशेष जिम्मेदारी बुलेटिन/प्रकाशन एवं वितरण कोर पर लगाई गई है।

कोर समूहों की जिम्मेदारियां: 
1. दलित विमर्श कोर: संयोजक - अमृत लाल एवं सदस्य - नन्दकिशोर, राममेहर और अनिता बगोटिया।
2. महिला विमर्श कोर: संयोजक -  अनिता शर्मा एवं सदस्य - मनीषा, राजबाला और शीतल।
3. युवा विमर्श कोर: संयोजक - अनिता बगोटिया एवं सदस्य - राममेहर और सतीश।
4. अल्पसंख्यक विमर्श कोर: संयोजक - सुलेख चन्द एवं सदस्य - सोहन दास, मनीषा और मदनपाल।
5. शिक्षा कोर: संयोजक - मा0 वजीर सिंह एवं सदस्य - सतीश, शीशपाल, वजीर सिंह, रमेश चन्द्र, नन्दकिशोर, राजबाला, रामफल और शीतल। 
6. साईंस कोर: संयोजक - वेदप्रिय एवं सदस्य - सतबीर नागल, वेदप्रिय, मा0 रमेश चन्द्र और डॉ0 रणबीर दहिया। 
4. स्वास्थ्य कोर: संयोजक - डॉ0 रणबीर दहिया एवं सदस्य - धर्मसिंह, वजीर सिंह, सोहनदास, राममेहर और सतपाल आनन्द।
5. कृषि कोर: संयोजक -  बलजीत भ्याण एवं सदस्य - धर्म सिंह, मदनपाल और राममेहर।
6. सांस्कृतिक कोर: संयोजक - नरेश प्रेरणा एवं सदस्य - डॉ0 रणबीर दहिया, अनिता शर्मा, सतबीर और अमृतलाल।
7. बुलेटिन/पुस्तक प्रकाशन एवं वितरण कोर: संयोजक - मनीषा एवं सदस्य - डॉ0 रणबीर दहिया, वेदप्रिय, मा0 वजीर सिंह और वेदपाल।

उपरोक्त सांगठनिक जिलों के अलावा संपर्क वाले जिलों में भी काम की शुरूआत करने हेतु राज्य कार्यकारिणी के निम्नलिखित साथियों की डयूटी लगाई गई।
1. सिरसा व फतेहाबाद - अनिता शर्मा और मा0 रमेश चन्द्र।
2. कुरुक्षेत्र - अमृतलाल और रामफल मलिक।
3. सोनीपत - सतीश और मदनपाल।
4. गुरुग्राम व मेवात - सतबीर नागल, शीशपाल व मा0 वजीर सिंह।
5. झज्जर, दादरी, पंचकुला और यमूनानगर - मा0 वजीर सिंह, वेदप्रिय और अनीता बगोटिया।
राष्ट्रीय नेतृत्व से तालमेल
राष्ट्रीय नेतृत्व से हमारा निरन्तरता में तालमेल एवं विमर्श बहुत ही गहरा रहता है। हर तरह की कार्यशालाओं, मीटिंगों में हमारी भागीदारी जीवंतता के साथ रहती है। विभिन्न राज्यों में हमारा नेतृत्व स्रोत व्यक्तियों के तौर पर भी शामिल रहता है।

राष्ट्रीय/जोनल कार्यक्रम एवं उनमें भागीदारी
30 अप्रैल 2023 को दिल्ली में हुई राष्ट्रीय शिक्षा असेंबली में हरियाणा के 9 जिलों से 110 व 5 सहयोगी संगठनों के 30 यानी कुल मिलाकर 140 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जबकि हमारा कोटा मात्र 100 प्रतिनिधियों को शामिल का था। इनमें करनाल, जींद व रोहतक के हमारे 7 वालंटियर्स भी शामिल हैं। असेंबली में देशभर के 14 राष्ट्रीय संगठनों से 600 से ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए। केरल की उच्च शिक्षा मंत्री ने ओपन सेशन का मुख्य वक्तव्य रखा था जबकि जम्मू एंड कश्मीर के पूर्व विधायक यूसुफ तारिगामी विशेष तौर पर शामिल रहे। इस सत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की खामियों को ठोस एवं सरल रूप में रेखांकित किया गया। राष्ट्रीय शिक्षा असेंबली में किए गए आहवान अनुसार शिक्षा नीति की जनविरोधी खामियों पर व्यापक विमर्श करने के लिए नाटक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर ज्यादा जोर दिया गया चिराग योजना जैसी योजनाओं के खतरे पर आम लोगों से ज्यादा चर्चा करनी जानी चाहिए।

नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यशाला बहुत ही बेहतरीन रही जिसमें 10 विषयों पर काफी गहन विचार विमर्श किया गया। कार्यशाला में 11 हिंदी भाषी राज्यों के करीब 70 नेतृत्वकारी साथियों ने भाग लिया। जिनमें हरियाणा से 8 साथियों ने भाग लिया। खास बात यह रही कि इस बार सभी विषयों के नोट्स की हार्ड एवं सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध करवाई गई हैं जिन्हें भविष्य में कभी भी प्रयोग किया जा सकता है। कार्यशाला के लिए आर्थिक सहयोग के रूप में 15000 का कोटा लगा था। जो तीनों संस्थाओं (भ्ळटैए ठळटैए भ्टड) द्वारा बराबर-बराबर जमा करवा दिया गया है।
6 अगस्त 2023 को दिल्ली में साइंटिफिक टेंपरामेंट वर्कशॉप और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग में सुरेश कुमार और श्री रमेश चन्द्र ने भागीदारी की।
 
‘‘जलवायु परिवर्तन का कृषि पर असर’’ समेत विभिन्न समस्याओं पर चेन्नई में हुई वर्कशॉप में डॉक्टर धर्म सिंह और मा0 वजीर सिंह ने भाग लिया। इसी प्रकार ‘‘साइंटिफिक टेंपरामेंट’’ पर हैदराबाद में हुई वर्कशॉप में डॉक्टर सुरेंद्र कुमार ने भाग लिया।
दिनांक 30 नवम्बर से 3 दिसम्बर 2023 को हिमाचल प्रदेश के नगवाई, जिला मण्डी में क्षेत्रीय स्वास्थ्य कार्यशाला हुई थी। जिसमें उतरी भारत के 8 राज्य शामिल हुए थे। हरियाणा से 4 साथी सुरेश कुमार, सतपाल आनन्द, शीतल और जरासो शामिल हुए थे। देश भर में अभियान चलाने के लिए जल्द ही राज्यों की कार्यशालाएं करने की योजना बनी है। इसी कड़ी में जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा की भी बैठकों के जरिए कुछ सक्रियता बनी है।

गत 30-31 अगस्त 2024 को ।प्च्ैछ की नॉर्थ जॉन की मीटिंग/कार्यशाला डक्न् रोहतक में आयोजित की गई। जिसमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा से 60 साथियों ने भाग लिया। इसमें शिक्षा, वैज्ञानिक मानसिकता, जेंडर एंड सोशल जस्टिस, स्वास्थ्य, कृषि और जलवायु परिवर्तन पर रिसोर्स पर्सन्स द्वारा वक्तव्य रखे गए। जिन पर आपसी विचार-विमर्श कर भावी योजना बनाई गई। सभी के ठहरने, खाने, बैठने आदि की व्यवस्था सुचारू थी। एमडीयू प्रशासन का सहयोग बहुत अच्छा रहा। कार्यक्रम पर करीब ₹50000 खर्च हुआ। उक्त मीटिंग/कार्यशाला की पूर्व तैयारी हेतु भ्ळटैए भ्टड और ठळटै के प्रधान एवं सचिवों की संयुक्त मीटिंग ऑनलाइन आयोजित की गई थी। जिसमें पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा करते हुए कार्ययोजना बनाई गई थी। जिससे तीनों की उपयुक्त भागीदारी हो गई थी लेकिन इसकी सभी तरह की तैयारियों का बोझ एवं खर्च का अधिकतम बोझ भ्ळटै को ही उठाना पड़ा। ठळटै की ओर से कोई आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाया।
बीजीवीएस की नेशनल (19-21 जनवरी, 2024) कॉन्फ्रेंस, धनबाद (झारखण्ड) में एचजीवीएस से प्रमोद गौरी व मनीषा और बीजीवीएस से संतोष मुदगिल, शीशपाल व सीताराम ने भागीदारी की।

डिक्लेयरेशन आॅफ सांईंटिफिक टैम्परामैंट कार्यक्रम: विज्ञान दिवस के मौके पर गत 28 फरवरी 2024 को कोलकाता में हुए डिक्लेयरेशन आॅफ सांईंटिफिक टैम्परामैंट कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें हरियाणा से प्रमोद गौरी, सुरेश कुमार, वजीर सिंह और रमेश चन्द्र सहित 9 साथियों ने भाग लिया।

सामाजिक न्याय और समता पर दिनांक 26-28 नवम्बर को जयपुर (राजस्थान) में वर्कशाप: इस वर्कशाप में समता कोर समूह, बीजीवीएस और एचजीवीएस के मुख्य नेतृत्व ने भाग लिया।
अखिल भारतीय जनविज्ञान नेटवर्क की कोलकाता में 27-30 दिसम्बर 2024 को राष्ट्रीय कांग्रेस: इस राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रदेश की तीनों संस्थाओं से निर्धारित डेलीगेट साथियों ने भाग लिया।
पुस्तकालय आन्दोलन को लेकर दिल्ली में हुई दो दिवसीय कार्यशाला में सोहन दास, रमेश चन्द्र, शीशपाल और दो युवा साथी पानीपत से शामिल रहे।
केरल के वायनाड में आई आपदा के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा की गई अपील के अंतर्गत राज्य की ओर से फौरन ₹20000/- की मदद भेजी गई। जो सभी जिलों अपनी यथासंभव मदद को राज्य केंद्र के पास भेजने पर संभव हो पाया।
राष्ट्रीय ब्रेनस्टॉर्मिंग कार्यशाला: अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क द्वारा 25 से 27 अक्टूबर तक भोपाल में राष्ट्रीय ब्रेनस्टॉर्मिंग कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें भ्ळटै से 7, ठळटै से 3 और भ्टड से 2 साथियों ने भाग लिया। कार्यशाला में मुख्य विमर्श विशिष्ट क्षेत्र एवं विषयों पर ।प्च्ैछध्ठळटै द्वारा किए जा रहे कार्यों के परिप्रेक्ष्य को और ज्यादा स्पष्ट एवं विकसित करना था। ताकि अन्य व्यापक जनसंगठनों, नागरिक समाज संगठनों आदि के सामान्यीकृत विचारों से हम अलग लगें। इसके साथ ही भारत का भविष्य पर एक राष्ट्रव्यापी जनसंपर्क अभियान की ठोस योजना बनाना और पूरे संगठनात्मक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की गई है। उक्त कार्यशाला में मुख्य विषयों के तौर पर जेंडर, युवा, सामाजिक न्याय, मीडिया एवं सोशल मीडिया और संस्कृति आदि थे।
शिक्षा के मुद्दे पर चेन्नई में राष्ट्रीय कार्यशाला: दिल्ली जंतर-मंतर पर शिक्षा के मुद्दे को लेकर हुए संयुक्त प्रदर्शन में प्रमोद गौरी एवं मनीषा समेत कई साथी शामिल हुए। अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के पांच साल पूर्ण होने पर इसके विभिन्न पहलुओं की समीक्षा हेतु 27-28 दिसंबर 2025 को चेन्नई में एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें हरियाणा से 6 साथी शामिल रहे। जिनमें स्कूली शिक्षा पर चर्चा हेतू वजीर सिंह और नंदकिशोर तथा हायर शिक्षा पर चर्चा हेतू प्रमोद गौरी सहित सहयोगी संगठनों से तीन अन्य वरिष्ठ साथी शामिल हुए। इस कार्यशाला में भागीदारी से पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में एक विस्तृत सर्वेक्षण भी किया गया जिसका फॉरमेट राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा उपलब्ध करवाया गया था। 
जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा स्वास्थ्य के मुद्दे पर व्यापक चर्चा एवं आगामी आंदोलन की योजना बनाने के लिए गत 11-12 दिसंबर को राष्ट्रीय कन्वेंशन का आयोजन जवाहर भवन, नई दिल्ली में किया गया। जिसमें 23 राज्यों के करीब 600 कार्यकर्ताओं एवं संगठनकर्ताओं ने भारी उत्साह से भाग लिया। जिनमें हरियाणा से विभिन्न संगठनों से जुड़े करीब 65 साथियों ने भी शिरकत की। इस मौके पर जन स्वास्थ्य अभियान के गठन के 25 साल पूर्ण होने पर सिल्वर जुबली मनाते हुए अब तक के तमाम संघर्षों को याद किया गया।
सम्मेलन एवं राष्ट्रीय कार्यशाला: तर्कशील सोसायटी पंजाब की पहल पर पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी उतर भारत की तर्कशील एवं विज्ञान के प्रचार-प्रसार में लगी संस्थाओं को आमंत्रित कर 21-22 फरवरी 2026 को उत्तराखंड के रामनगर में एक सम्मेलन एवं क्षेत्रिय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें हरियाणा से संदीप महिया शामिल हुए।

राज्य केेन्द्र/सचिवमण्डल द्वारा किए गए कार्य एवं गतिविधियां
वैज्ञानिक मानसिकता अभियान: डॉ नरेंद्र दाभोलकर की याद में मनाए जाने वाले वैज्ञानिक मानसिकता दिवस पर भ्ळटै और भ्टड की संयुक्त पहलकदमी पर आगामी 20 अगस्त 2023 को प्द क्मंिदबम व िैबपमदबम के लिए एक राज्य स्तरीय कार्यक्रम करनाल में आयोजित किया गया। जिसमें दोनों वक्ताओं के वक्तव्य और अध्यक्ष की टिप्पणी बेहद सारगर्भित रही। हाजिरी भी उम्मीद से ज्यादा रही मगर काफी लोगों की चेतना का लेवल बेहद कमजोर था। हिसार से हाजिरी बेहद कम हो पाई। इनके अलावा अध्यापकों की भागीदारी का काम होना, बच्चों द्वारा शोर शराबा करना, पूर्वानुमान से ज्यादा खर्च का होना और माइक सिस्टम का सुचारु न होना आदि काफी चिंताजनक बातें रही थी। वैज्ञानिक मानसिकता के प्रथम फेज के क्लमीनेशन और द्वितीय फेज की शुरूआत के लिए गत 2 फरवरी, 2025 को जीन्द में हुए राज्य स्तरीय कार्यक्रम में सभी जिलों की अच्छी भागीदारी रही। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर 28 फरवरी को अधिकतर जिलों में स्कूलों में आयोजन किए हैं। 
वैज्ञानिक मानसिकता अभियान के दूसरे फेज के अंतर्गत अध्यापकों एवं छात्रों से संवाद बढ़ाने के लिए “वैज्ञानिक चेतना का विकास” नामक पुस्तिका पर छात्रों के एग्जाम लेने की योजना बनाई गई है। वैज्ञानिक मानसिकता पर हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति और हरियाणा विज्ञान मंच के संयुक्त तौर पर राज्य स्तरीय कार्यशाला 29-30 अक्टूबर 2023 को हिसार में आयोजित की गई। इस कार्यशाला से निकले निष्कर्श अनुसार राज्य भर में 28 फरवरी 2024 तक लगभग 100 विज्ञान मेले लगाने की योजना बनाई गई। लेकिन हम इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए। इसके अलावा रोहतक, गुरूग्राम में भी क्षेत्रीय कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। 
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर 1 मार्च 2026 को तीसरे फेज या चरण का कल्मिनेशन आॅनलाइन किया गया है। इस मौके पर हमारे अध्यापकों द्वारा लिखे गए निबंधों पर समीक्षात्मक चर्चा करते हुए आगे निरन्तरता बनाए रखने के प्रयासों पर सहमति है।

संविधान का ड्राफ्ट:  संगठन के संविधान का ड्राफ्ट राज्य कार्यकारिणी के सभी सदस्यों के पास भेज दिया गया था जिस पर सभी साथियों ने अपने बहुमूल्य सुझाव दिए हैं। उन्हीं सुझावों के आधार पर अपडेट करते हुए इसे पुनः राज्य कार्यकारिणी के वाट्सएप ग्रुप में डाला गया ताकि कोई भी साथी अन्य सुझाव देना चाहे तो दे सके। फिर इसे राज्य सम्मेलन में आज पेश कर सर्वसम्मति से पारित करवाकर जारी किया जाएगा।

स्मारिका-2023: गत 10वें राज्य सम्मेलन के अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया था जिसमें दो मुख्य बिंदु के तौर पर वैचारिक लेख और विज्ञापन प्रकाशित किए गए थे। इन विज्ञापनों के जरिए करीब 3ः00 लाख रुपए की राशि जुटाई गई थी। यही प्रयास इस सम्मेलन के अवसर पर भी किया गया है।
जिलों से तालमेल: राज्य केन्द्र द्वारा नियमित तौर पर जिला नेतृत्व से तालमेल किया जाता है। पूर्व सूचना के आधार पर जिला मीटिंगों और अन्य कार्यक्रमों में भागीदारी का हर संभव प्रयास किया जाता है। लेकिन कुछ जिलों द्वारा पूर्व सूचना के बिना रखे गए कार्यक्रमों या मीटिंगों में भागीदारी संभव नहीं हो पाती। इसके बावजूद जिलों के साथ संवाद हेतू आॅनलाइन प्रयास भी किए जाते हैं।

अन्य संस्थाओं से तालमेल: दलित अधिकार मंच हरियाणा के दिनांक 22-23 जुलाई, 2023 को जीन्द में हुए राज्य स्तरीय सांगठनिक सम्मेलन में हमारे सामाजिक न्याय के दलित कोर समूह की महत्वपूर्ण भूमिका रही।  हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ, हरियाणा विज्ञान मंच, भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, दलित अधिकार मंच हरियाणा,  ग्रेवाल संस्थान कुरुक्षेत्र आदि संगठनों के साथ विभिन्न मुद्दों पर ज्यादा विचार-विमर्श करने हेतु नेटवर्किंग किया जाता है।

नई शिक्षा नीति-2020 पर 3 सितम्बर 2023 को रोहतक में राज्य स्तरीय कन्वेंशन हुई। जिसमें करीब 300 लोगों ने भागीदारी की और करीब एक दर्जन वक्ताओं ने बातचीत रखी। कुछ प्रबुद्ध लोगों ने टिप्पणियां भी रखी। कुल मिलाकर कार्यक्रम काफी अच्छा व सराहनीय रहा। 

दलित विमर्श पर कार्यशाला: दलित विमश पर 30-31 मार्च 2025 को कैथल में हुई राज्य स्तरीय कार्यशाला में अनेक बाधाओं के बावजूद 17 राज्य कार्यकारिणी सदस्यों सहित करीब 70 साथियों ने भागीदारी की। जिसमें तीन विषयों 1. ‘‘वर्तमान में दलितों की स्थिति,’’ 2. ‘‘दलित समाज में नवजागरण की चुनौतियां एवं संभावनाएं,’’ 3. ‘‘दलित समाज में विमर्श के लिए ज्ञान विज्ञान आंदोलन के काम’’ पर स्रोत व्यक्तियों द्वारा बातचीत रखी गई। जिन पर सभी प्रतिभागियों ने गंभीरता पूर्वक वैचारिक विमर्श किया गया। कार्यशाला हर लिहाज से यानी ठहरने एवं खाने की व्यवस्था, प्रतिभागियों की उपस्थिति, वैचारिक विमर्श में भागीदारी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आदि दृष्टिकोणों से सफलतापूर्वक संपन्न हुई। हालांकि भिवानी और हिसार के साथी दूसरे दिन शामिल नहीं रह पाए। 
मेरे घर आकर तो देखो अभियान: स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 2024 के मौके पर ‘‘मेरे घर आकर तो देखो’’ अभियान चलाकर आपसी भाईचारे हेतु अल्पसंख्यकों एवं दलितों के घरों में परिवारों सहित जाकर आजादी का जश्न मनाया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यक एवं दलित साथियों के साथ घरों में जाकर साझा विचार-विमर्श किया गया। अल्पसंख्यक विमर्श कोर की ऑनलाइन मीटिंग में खास बात यह उभरी कि हमें अल्पसंख्यक तबकों की स्थिति को समझने के लिए ठोस अध्ययन करने तथा परिप्रेक्ष्य लिखने तथा सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को पढ़कर आत्मसात करना चाहिए। इस कार्यक्रम को लगातार जारी रखने का प्रयास करना चाहिए और इसकी डॉक्युमेंटेशन भी करनी चाहिए। 
बाइक जत्था और मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा: सेहर हाशमी के नेतृत्व में पहुंचे बाइक जत्था के सफल आयोजन हुए। बाइक जत्थे का नरवाना में तीन जगह पर कार्यक्रम किया गया एक स्कूल एक पॉलिटेक्निक में और तीसरा किसान धरना पर। मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर चर्चा हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की गई जो काफी अच्छी रही।

महिलाओं की स्थिति पर सर्वेक्षण: रोहतक में एम.डी.यू. के छात्रों ने महिलाओं की स्थिति पर एक गांव के 110 घरों का सर्वेक्षण किया है जिसकी समीक्षा में जिला नेतृत्व साथी शामिल रहा है। ये छात्र कुछ समय के लिए हमारे पास इंटर्नशीप पर आए हुए हैं। छोटी-छोटी मीटिंगों के जरिए संगठन निर्माण का प्रयास किया जा रहा है। 
जन स्वास्थ्य अभियान: जन स्वास्थ्य अभियान की राज्य स्तरीय कन्वेंशन 23 नवम्बर 2025 को रोहतक में आयोजित की गई। इसके आयोजन की मुख्य जिम्मेदारी हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति द्वारा निभाई जबकि अन्य संगठनों ने सहयोग किया। 
जीन्द जिला की समीक्षा रिपोर्ट: राज्य कार्यकारिणी में जिलों की समीक्षा हेतू लिए निर्णय अनुसार केवल जीन्द और पानीपत जिलों की ही विस्तृत समीक्षा हो पाई लेकिन अन्य जिलों ने समीक्षा हेतू पहल नहीं कर पाए।
युवाओं मुद्दों पर कार्यशाला: समालखा (पानीपत) में युवाओं की दो दिवसीय कार्यशाला हुई है जिसमें करीब 50 युवाओं एवं संगठनकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यशाला में ‘‘आज का युवा जीवन और चुनौतियां, ज्ञान-विज्ञान आंदोलन और वर्तमान दौर तथा संगठन के काम और हमारी भूमिका’’ विषयों पर व्यापक विमर्श किया गया है। चर्चा के दौरान युवाओं के मसलो पर व्यापक विचार-विमर्श करते हुए एक सामूहिक अप्रोच बनाने का ठोस सुझाव भी आया। 
कृषि: कृषि के मुद्दे पर भी हिसार में दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई है। जिसमें करीब 40 किसानों एवं संगठनकर्ताओं ने भाग लिया। जिसमें सस्ती खेती, टिकाऊ खेती, वैज्ञानिक खेती पर विमर्श किया गया है। इस कृषि कार्यशाला में ‘‘किसान खेत स्कूलों का अनुभव, समीक्षा, नवाचार और भविष्य की योजना तथा जहरमुक्त कृषि उत्पादों की को-ऑपरेटिव मार्केटिंग और वैल्यू एडिशन’’ विषयों पर व्यापक चर्चा की गई। इसके बाद स्टेट कृषि कोर समूह की पहलकदमी पर दुसरी कार्यशाला दिनांक 23-24 अगस्त 2025 को जाट धर्मशाला, हिसार में राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें पहले दिन करीब 100 और दूसरे दिन करीब 60 साथियों ने भाग लिया। जहर मुक्त खेती और जहर मुक्त थाली के कांसेप्ट को आगे बढ़ाने के लिए काफी अच्छा विचार-विमर्श किया गया। जींद और पानीपत में भी कृषि कार्य को लेकर अतिरिक्त प्रयास किए जाने की योजना बनी है।
लर्निंग सैंटर: लर्निंग सैंटर की परिकल्पना पर विस्तृत चर्चा करते हुए हर इकाई में लर्निंग सैंटर को स्थापित कर संचालित करने का निर्णय लिया गया लेकिन इस पर विमर्श एवं फीडबैक कमजोर है और उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी हुई है।

ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन: हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति द्वारा प्रकाशित ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन हमारा मुखपत्र है लेकिन अनियमितकालीन है। इसकी 1000 प्रतियां औसतन दो माह में प्रकाशित हो पा रही हैं। इनमें से 150 प्रतियां हिमाचल प्रदेश द्वारा भी ली जा रही हैं, शेष प्रतियां विभिन्न जिलों में वितरित होती हैं। गत सम्मेलन के बाद से इसका प्रकाशन लगातार किया गया है और अब तक 40वें अंक तक का प्रकाशन कर वितरण किया गया है। जिसमें कोर समूह द्वारा नियमित विमर्श उपरांत सामूहिकता से निर्णय लेकर वर्तमान की जरूरत अनुसार सामग्री प्रकाशित की है।

वित्तिय प्रबंधन: वित्तिय प्रबंधन के लिए हर साल योजना बनाकर लागू करने का प्रयास किया गया है। सभी जिलों द्वारा यथासंभव सहयोग किया जाता है। स्टेट अकाउंट वर्ष 2022-23, 2023-24, 2024-25 का ऑडिट करवाया। गुरुग्राम में 20 अप्रैल 2025 को चंदा अभियान चलाया गया। टीम में डाॅ. रणबीर दहिया, सोहन दास, मनीषा और सुरेश कुमार शामिल रहे। करीब 45000/- रूपये चंदा किया गया।
हिमाचल में आई बाढ़ से भारी तबाही हुई है। जिससे मंडी एरिया सैंकड़ों घर बह गए हैं जिनमें हमारे आंदोलन में काम कर रहे परिवार भी उजड़ गए हैं। हिमाचल ज्ञान विज्ञान समिति और ।प्च्ैछ ने सभी राज्यों से बढ़चढ़ कर मदद करने की अपील की है। इसके लिए स्टेट कमेटी की ओर से सभी जिलों के सहयोग से ₹20000/- की राशि हिमाचल को भेज दी गई है।
साथी अजमेर चैहान को आर्थिक मदद: ज्ञान-विज्ञान आंदोलन की अपील पर हमारे आन्दोलन के साथी अजमेर चैहान के टांगों के आॅप्रेशन एवं इलाज के लिए राज्य भर से बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद दिलाई गई।
सदस्यता: हर वर्ष सदस्यता के नवीनीकरण की योजना बनाई जाती है। लेकिन हमारी सदस्यता औसतन करीब 1000 के आसपास रहती है। कुल मिलाकर सदस्यता अभियान काफी ढ़ीला-ढ़ाला रहता है जो संगठन की नाजुक हालात को दर्शाता है क्योंकि हमारी पहुंच एवं संवाद सभी सदस्यों तक नहीं बन पाई है। ऐसे में संगठन का विस्तार नहीं हो पा रहा है। सदस्यता के वैचारिक स्तर को ऊंचा उठाने, मजबूत संगठन के निर्माण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। जबकि हमें सभी कार्यों को इंटीग्रेटिड करने की समझ को विकसित करने की ओर बढ़ना चाहिए।

राज्य मुख्यालय के लिए खरीदे गए प्लाॅट की स्थिति: आजादगढ़, रोहतक में ज्ञान-विज्ञान आन्दोलन का 320 गज का एक प्लाॅट पड़ा है जो भ्टड के नाम से खरीदा गया था। लेकिन बाद में इसकी इब्बा रजिस्ट्री भ्टड - भ्ळटै के नाम करवा ली गई थी। जिसे बेचकर अब 200 वर्ग गज का प्लाॅट रोहतक में सैक्टर-5 के पीछे, गांधी स्कूल के नजदीक खरीदा गया है। प्लॉट की बिक्री के संबंध में सब कुछ हिसाब-किताब हो चुका है। जिसमें से हमारे पास ₹13 लाख रुपए की नकद राशि बची है। इस पर सहमति बनाई गई है कि इस राशि की फाउंडेशन डाल दी जाए यानि कि प्लाट की नीव वगैरा भरवा ली जाए और इसके लिए जल्द नक्शा बनवाकर कार्रवाई कर ली जाए। प्लॉट के नक्शे पर रोहतक स्थित साथी काम कर रहे हैं। नए खरीदे गए प्लांट को व्यक्तियों के नाम रजिस्टर करवाया गया है और जल्द ही प्रयास रहेगा कि उसे संगठन के नाम करवाया जाए।

पुस्तकों का प्रकाशन: राज्य केन्द्र द्वारा नेशनल केन्द्र पर अंग्रेजी में तैयार पुस्तिका को ‘‘आधुनिक भारत की संकल्पना’’ यानि आईडिया ऑफ इंडिया पुस्तिका के नाम से हिन्दी में 2000 प्रतियों का प्रकाशन करवाया गया है। जिनकी बिक्री कर दी गई है।

गौहर रजा से प्राप्त पुस्तकें: गौहर रजा द्वारा हमें सैंकड़ों पुस्तकें उपलब्ध करवाई हैं जिन्हें रिकाॅर्डबद्ध किया जा रहा है।