*'भविष्य का भारत' पर राष्ट्रव्यापी अभियान*
*बेहतर भविष्य की खोज में हम, आप और सब*
हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति, हरियाणा
अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क और भारत ज्ञान-विज्ञान समिति अगले साल भर देशव्यापी अभियान चलाकर आम जन के साथ संवाद स्थापित कर रहे हैं। संवाद का मकसद समाज के सभी तबकों की हालत, ज़रूरतों और अपेक्षाओं को उभारना है। भारत के उज्जवल भविष्य के लिए जन आकांक्षाओं को देश के सामने लाना ज़रूरी है क्योंकि आज हमारा देश एक अजीब-सी स्थिति में से गुज़र रहा है। सत्ता पक्ष का शोर चारों ओर सुनाई देता है जहां यह बात बार-बार कही जा रही है कि हम चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहे हैं। लेकिन यह अधूरा सच है। तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक है जो बताया नहीं जाता। देश में 100 करोड़ से अधिक लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, साफ़ पानी, सम्मानपूर्ण ज़िंदगी जैसी बुनियादी चीज़ों से वंचित हैं। एक तरफ़, दुनिया में सबसे अमीर लोगों की श्रेणी में खड़े लोग और दूसरी तरफ़, बेहद गरीब करोड़ों भारतवासी। क्या यह स्थिति संकटपूर्ण नहीं है? क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए? जनसंवाद के इस राष्ट्रव्यापी अभियान में हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति प्रदेश के हालात को लेकर जन संवाद के कार्यक्रम चलाएगी। अभियान के दौरान 15 सितंबर 2026 से 31 मई 2027 तक संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ये संवाद कार्यक्रम छोटी-छोटी बैठकों, सेमिनारों, कला जत्थों, नाटकों, किस्सा-गोई, पुस्तक-वाचन एवं प्रदर्शनियों आदि के माध्यम से होंगे। समिति द्वारा संवाद के लिए कई बिंदुओं को विशेष तौर पर चिह्नित किया गया है।
*हरियाणा की आबादी*
वर्तमान हरियाणा की कुल आबादी 3.14 करोड़ है। इसमें 1.66 करोड़ पुरुष और 1.48 करोड़ महिलाएं हैं। इसमें ग्रामीण आबादी लगभग 57 प्रतिशत और शहरी आबादी लगभग 43 प्रतिशत है। लगभग 30 लाख प्रवासी श्रमिक भी हैं। प्रांत में 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग में लगभग 50 लाख युवा हैं।
*क्या हैं हमारी चिंताएं?*
*गरीबी और असमानता*
पहला चिंताजनक पहलू गरीबी है। प्रांत की कुल आबादी का लगभग 40%, यानी 1.24 करोड़, लोग 5 किलो मुफ़्त अनाज पर गुज़र-बसर करते हैं। इन लोगों की मासिक आय ₹13000 से भी कम है। ऐसी स्थिति में बच्चों की शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल, परिवार का स्वास्थ्य, पीने का साफ़ पानी, रहने के लिए हवादार मकान जैसी मूलभूत ज़रूरतों की कमी बनी रहती है।
हरियाणा में संसाधनों के स्वामित्व और आमदनी में अंतर इतना अधिक है कि आम आदमी की कल्पना में भी नहीं हो सकता। एक तरफ़ तो 5 किलो मुफ़्त अनाज पर जीना पड़ता है और दूसरी तरफ़, हरियाणा के एक उद्योगपति ने हाल की तिमाही में 4696 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा कमाया है। इसी असमान आमदनी की वजह से ही हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय ₹3,95,000/- प्रति माह दिखाई ज़रूर देती है परन्तु हकीकत तो यह है कि इस औसत आय का गरीब आदमी के लिए कोई अर्थ नहीं है। आंकड़ों के खेल में उलझी हमारी अर्थव्यवस्था के पास गरीब आदमी के लिए कोई समाधान नहीं है।
*प्रदेश में शिक्षा की स्थिति*
*स्कूली शिक्षा*
प्रदेश की शिक्षा की स्थिति पर नज़र डालें तो स्थिति बहुत खराब दिखाई देती है। पिछले 7 वर्षों में माध्यमिक स्तर के निजी स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गई है। वर्ष 2018 में यह संख्या 1979 थी जो 2025 में बढ़कर 4057 हो गई है। निजी उच्च शिक्षा विद्यालय 1877 से बढ़कर 2096 हो गए हैं। इसके विपरीत सरकारी स्कूलों में उच्च शिक्षा विद्यालयों की संख्या 1207 से घटकर 858 रह गई है। कुछ स्कूलों को माध्यमिक स्तर में तब्दील किया गया है लेकिन अनेक स्कूल बंद भी किए गए हैं। निजी विद्यालयों की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार निजी स्कूलों में प्रतिवर्ष औसत खर्च ₹48636/- है जबकि सरकारी स्कूल में ₹4479/- है अर्थात् निजी स्कूलों में पढ़ाई का खर्च सरकारी स्कूल की बजाय 11 गुणा अधिक है।
*उच्चतर शिक्षा*
इसी तरह से उच्चतर शिक्षा के लिए महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की स्थिति भी लगभग गरीब लोगों को बाहर धकेलने की दिशा में जा रही है। प्रदेश में 219 सरकारी कॉलेज और 1185 निजी कॉलेज हैं। इन कॉलेजों में इंजीनियरिंग, कानून, प्रबंधन आदि के संस्थान भी शामिल हैं। प्रदेश में 10 सरकारी विश्वविद्यालय और 25 निजी विश्वविद्यालय हैं। यहां भी उच्चतर शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में स्थापित है। निजी क्षेत्र की शिक्षा निश्चित रूप से महंगी है। इसका प्रभाव यह है कि 18-23 आयु वर्ग के केवल 33.3 प्रतिशत युवा शिक्षा के दायरे में हैं, शेष 66.7% उच्चतर शिक्षा से बाहर हैं। इस वर्ष के दाखिलों से पता चलता है कि शिक्षा के दायरे में आने वाले छात्रों की संख्या और भी कम हो रही है। विभाग की अपनी सूचना के अनुसार लगभग सभी कॉलेजों में हज़ारों सीटें खाली हैं। सबसे बड़ा कारण प्राध्यापकों की भारी कमी है। साथ ही इतनी बड़ी संख्या में बाहर होने के कई अन्य कारण भी हैं - गरीबी, रोज़गार की कम होती संभावनाएं, छोटे-छोटे कोर्स करके जीवन की गुज़र-बसर की स्थिति में पड़ जाना आदि। दलित समाज से आने वाले युवाओं की हालत और भी खराब है। उनमें से 73.5 प्रतिशत युवा उच्चतर शिक्षा से बाहर हैं। गरीबी और कम आयु में रोज़गार में लगने के अलावा इन समुदायों के युवाओं को सामाजिक भेदभाव की वजह से भी शिक्षा छोड़नी पड़ती है। शिक्षण संस्थानों में भी जातिगत उत्पीड़न की अनेक घटनाएं होती हैं।
*स्वास्थ्य की स्थिति*
आज स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है। हर व्यक्ति योग्यता प्राप्त डॉक्टर से इलाज करवाना चाहता है। हरियाणा में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है। भारतीय जन स्वास्थ्य मापदंडों के अनुसार हरियाणा में कुल 850 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र होने चाहिए परंतु आज तक 477 केंद्र ही हैं। 373 केंद्रों की कमी है, यानी गांव में कुल आबादी के हिसाब से ज़रूरत के आधे से कुछ अधिक केंद्र ही काम कर रहे हैं। ये केंद्र दो तरह के हैं - पहले जो दिन में निश्चित घंटों के लिए खुलते हैं। इनमें 8 प्रतिशत केंद्र ऐसे हैं जहां योग्यता प्राप्त डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। दूसरे वे हैं जो 24 घंटे काम करते हैं। उनके लिए कम से कम दो डॉक्टर चाहिए लेकिन अधिकांश में एक ही डॉक्टर है। सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार 700 डॉक्टरों की कमी है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी है तो लोग कस्बों अथवा शहरों में ही आते हैं। अधिक संख्या में लोगों के यहां आने से यहां के सरकारी अस्पतालों में भी हर संसाधन की कमी बनी रहती है। इतना ही नहीं, यहां भी ज़रूरी मापदंडों से कम डॉक्टर, नर्सें और अन्य कर्मी उपलब्ध हैं। प्रांत में प्राइवेट अस्पतालों की संख्या बढ़ी है परंतु ये बहुत महंगे हैं और गांवों से दूर शहरों और कस्बों में हैं। गंभीर बीमारी होने पर तो लोगों के पास में निजी अस्पतालों में ही आने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।
*रोज़गार की स्थिति*
प्रांत में बेरोज़गारी बेतहाशा बढ़ रही है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलुरु के एक शोध में तो बेरोज़गारी दर 40 प्रतिशत तक बताई गई है। अगर हम राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों को सही मान लें तो भी 15-29 वर्ष के आयु वर्ग में हरियाणा में 81 लाख युवा हैं। इनमें से 48.84 लाख, यानी 60.3 प्रतिशत युवा या तो पढ़ते हैं या घरेलू काम करते हैं। शेष 39.7 प्रतिशत, यानी 32.6 लाख युवाओं में से 4.71 लाख (लगभग 15%) नौकरी ढूंढ रहे हैं जिन्हें नौकरी मिल नहीं रही। शेष 85 प्रतिशत अर्थात् 27.50 लाख नौकरियों में हैं। इनमें से भी 62 प्रतिशत (लगभग 17 लाख) युवाओं की नौकरियां बहुत कमज़ोर हालत की हैं। ये युवा कच्ची और ठेकाप्रथा की नौकरियों में लगे हैं जिनकी मासिक आय मात्र ₹9100 से ₹13500 तक ही रहती है। दरअसल यह आय एक दिहाड़ी मज़दूर से भी कम है। सारांश यह है कि कुल युवा आबादी जो 81 लाख है, में से लगभग 6 लाख युवा ही ठीक रोज़गार तक पहुंचे हैं।
*प्रांत में दलित उत्पीड़न*
हरियाणा में दलित समाज आरंभ से ही साधनहीन रहा है। कृषि-प्रधान समाज होने के बावजूद 20 प्रतिशत दलित आबादी के पास कुल कृषि योग्य भूमि का मात्र 2 प्रतिशत हिस्सा है। गांवों में 85 प्रतिशत दलित आबादी भूमिहीन है। दूसरों के खेतों में काम करने वाली मज़दूर आबादी है। कुछ दलित लोगों के पास ज़मीन है भी तो अधिकतम ढाई हेक्टेयर है। भूमि वाले दलित परिवारों के पास औसत 0.78 हेक्टेयर भूमि है। अधिकांश आबादी अपने जीवन-यापन के लिए ज़मींदारों पर निर्भर है। सन् 1900 में अंग्रेज़ सरकार ने कानून बनाया जिसके अनुसार दलित जातियां परंपरागत तौर पर ज़मीन की मिल्कियत न होने के कारण कृषि से जुड़ी नहीं हैं। इसलिए इन्हें ज़मीन खरीदने के अधिकार से वंचित किया जाए। यह मनुस्मृति के विधान की पुनरावृत्ति थी। आज़ादी के बाद भी प्रदेश में भूमि-सुधार लागू न होने के कारण स्थिति बेहतर नहीं हुई। इन लोगों का पूरा जीवन ज़मीन की मिल्कियत वाली जातियों पर निर्भर है जिससे उत्पीड़न की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
प्रांत में दलित महिलाओं के साथ सामूहिक उत्पीड़न, अंतरजातीय विवाह करने पर दलित युवकों की हत्याएं, पीने के पानी पर प्रतिबंध लगाना, मंदिर प्रवेश का विरोध, घुड़चढ़ी का विरोध, पेशाब पीने को मजबूर करना, ज़मीनों से बेदखल करवाना, शिक्षण संस्थानों में भेदभाव गहरे तक दलित समाज को प्रभावित करता है। आंकड़ों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष दलितों के खिलाफ़ 50000 से अधिक अपराध होते हैं। ऐसे असंख्य और अपराध भी होंगे जिनकी शिकायत दर्ज नहीं होती। हरियाणा में भी दलित-विरोधी अपराधों की संख्या बहुत अधिक है। हरियाणा में दलित महिलाओं के बलात्कारों की जघन्य घटनाओं में 62.5 प्रतिशत सामूहिक बलात्कार हैं। सवर्ण जातियों के पुरुष अपने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए, दलितों को नीचा दिखाने और हराने हेतु इसका इस्तेमाल करते हैं। इन अपराधों को सत्ता पक्ष का समर्थन भी मिला रहता है। इसलिए केवल 25% अपराधियों के खिलाफ़ ही कार्रवाई होती है। दलितों पर दबाव बनाकर गांव के प्रभुत्वशाली लोग समझौते करवाते हैं और पुलिस-प्रशासन भी समझौते करवाने के लिए तत्पर रहते हैं।
*प्रांत में महिलाओं की स्थिति*
महिलाओं की स्थिति बेहद खराब है। जन्म के समय लिंग अनुपात बहुत खराब है। वर्ष 2026 के शुरुआती 4 महीनों के आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा का लिंग अनुपात 1000: 895 है, अर्थात् जन्म के समय अगर 1000 लड़के पैदा होते हैं तो लड़कियां सिर्फ़ 895 ही होती हैं। लड़कियों का कम अनुपात दर्शाता है कि प्रदेश में भ्रूण हत्या जारी है। कुल आबादी में 1.66 करोड़ पुरुष हैं और 1.48 करोड़ महिलाएं हैं। महिलाओं की कम संख्या के चलते अन्य प्रांतों से खरीदकर लाने का चलन बढ़ रहा है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं का होना तो हर घर में इसलिए ज़रूरी होता है कि पूरे परिवार की सभी ज़रूरतों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी महिलाओं की है। परिवार का पूरा बोझ उठाने वाली महिला की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर बनी रहती है। प्रांत में आज भी कृषि एक मुख्य व्यवसाय है। खेती के कुल कार्य का 42 प्रतिशत महिलाएं करती हैं लेकिन कृषि योग्य भूमि का केवल 2 प्रतिशत ही महिलाओं की मिल्कियत में आता है। खेती के काम में सबसे मुश्किल कार्य झुकी कमर से होता है जिसका 90 प्रतिशत महिलाएं करती हैं जबकि खेत से होने वाली कुल आमदनी में से 10 प्रतिशत से भी कम आय महिलाओं को मिलती है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की है। इस स्थिति के चलते प्रांत में महिला उत्पीड़न भी बहुत भयावह है। बलात्कार, मारपीट, यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा की घटनाएं आम हैं। 2025 के सरकारी आंकड़ों में 1033 बलात्कार के मामले आए हैं। 1249 मामले ज़बरदस्ती उठाकर ले जाने के और 4562 मामले घरेलू हिंसा के दर्ज हुए हैं। ये मामले तो रिकॉर्ड में आ गए हैं जबकि ऐसे अनेक मामले सामने ही नहीं आ पाते हैं।
ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या हरियाणा विकसित प्रांत है? इस सवाल का उत्तर आप स्वयं बताएं। प्रांत की इन विकराल समस्याओं के अलावा कृषि क्षेत्र में कम होती आय, अत्यधिक रसायनों का इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की चुनौतियां, बढ़ता शहरीकरण आदि भी गंभीरता की मांग करते हैं। विडंबना तो यह है कि नीति-निर्माता इन मुद्दों पर कोई ध्यान देना नहीं चाहते और न ही जनमानस का ध्यान इन बातों की तरफ़ होने देना चाहते हैं।
हमें यह भी समझना होगा कि एक तो आम जन को जीवन-यापन के कामों से फ़ुर्सत नहीं मिलती और दूसरे, उन्हें धार्मिक कर्मकांडों, अंधविश्वासों, जातिवाद और सांप्रदायिक माहौल में फंसाकर रखा जाता है। एक उदाहरण से समझें। सावन के महीने में लाखो-लाख युवा कावड़ लेने के लिए चल पड़ते हैं। उनके लिए एक महीने तक उत्सव का वातावरण बनाया जाता है। साथ ही उनकी आस्था का दोहन करते हुए सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाती है। ऐसे मूल सवाल लेकर हम प्रदेश के नागरिकों से बात करेंगे।
*नागरिकों से संवाद*
हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति जन संवाद के ज़रिए लोगों के साथ वर्तमान हालात को लेकर विचार करेगी। आम जन अपने जीवन की समस्याओं को लेकर क्या समझ रखते हैं, समाधान को कैसे देखते हैं ?- इन सब बातों पर चर्चाएं होंगी। जनसंवाद को जनसाधारण के स्तर पर निरंतर बनाए रखने के लिए इलाके में चर्चामंडल का गठन किया जाएगा। यह चर्चामंडल समिति की स्थानीय इकाई के साथ तालमेल बनाकर समस्याओं को समझने और इनसे निपटने का सामूहिक प्रयास करेगा। चर्चामंडल अपने इलाके में पुस्तकालय, वाचनालय आदि भी खोलेगा। इलाके में भारत के संविधान के मूल्य पर आधारित जीवन-शैली विकसित करने के लिए कार्य किया जाएगा। आम जन जब तक एक नागरिक की हैसियत में नहीं आ जाता और समाज को समतामूलक बनाने की समझ धारण नहीं करता, तब तक हमारे प्रयास बार-बार होते रहेंगे।
उम्मीद है 'भारत का भविष्य' कार्यक्रम के साथ जुड़े करोड़ों भारतीयों के भविष्य को बेहतर बनाने की इस मुहिम के पहले चरण में हम सब मिलकर कार्य करेंगे।
*आपके सहयोग और भागीदारी की अपेक्षा के साथ,*
*राज्य कार्यकारिणी,*
हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति।