Saturday, January 1, 2011

तीर सच्चाई के

हम तीर सच्चाई के रूक रूक के चलाते हैं
दीवाने हैं इसके औरों को दीवाना बनाते हैं
हम रखते हैं ताल्लुक सफरिंग दुनिया से
उसके तस्सवुर में हम खवाब जगाते हैं
रहना होशियार उनके छलकते जामों से
ये मय के बहाने से बस जहर पिलाते हैं
चलना सही राहों पर रख जान हथेली पर
लूटेरे है धर्म की आड़ में खूब लूट मचाते हैं
साईनिंग जाल साजी रचते रचते हम पर
हम हैं की अपने से दीवाने बनाना चाहते हैं

बहन

मलिका शूटिंग के लिए एक
स्टेसन पर आती है
एक भिखारी आ जाता है
भिखारी --बहनजी एक रूपया देदो
मलिका ने उसे १००० रूपये दी दिए
सैकटरी--- १००० क्यूं दे दिए ?
मलिका -- पहली बार किसी ने बहन कहा

सच

ऑंखें सच की लिपि तो
पढ़ सकती हैं
उसका सन्देश नहीं
सन्देश आत्मसात होता है
महसूसती नजर से
धुंधला दिया जिसको
अतिज्ञानियों ने
कहकर दिव्यदृष्टि
"ओमसिंह ashfak "

माँ आली

कविता रमलू नै बोली - कोए इसी बात कर रमलू अक मेरा दिल जोर-जोर तैं धड़कन लागज्या !

रमलू - पाछै मुड़ कै देख तेरी माँ आवन लागरी सै!!!!

नंबर 4

एक दिन प्रेमिका ने मौका पाकर अपनी प्रेमी का मोबाइल चैक किया कि उसने किस नाम से उसका मोबाइल नंबर सेव किया है.

इसके लिए उसने अपने मोबाइल से प्रेमी के मोबाइल पर मिस काल किया तो उसमे लिखकर आया -

कालिंग बेकूफ नंबर 4

कोर्ट से बाहर

एक जज नै कहया : इतना मामूली सा झगड़ा तो थाम कोर्ट के बाहर भी निपटा सकते थे ।

आरोपियों में तै एक सैड दे सी बोल्या : हम कोर्ट के बाहर ही निपटावन लागरे थे अक पुलिस हमनै झगड़ा करने के इलजाम में यहां पकड़ ल्याई ।--

रफा दफा

दरोगाजी ने अपने बेटे से पूछा – “इतने कम नंबर क्यूँ आये ? आज से तेरा खेलना, टीवी देखना सब बंद !”

बेटा बोल्या – “पापा, ये लो 250 रुपये और बात नै रफा दफा करो