Wednesday, February 8, 2023

ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया ! क्यों ?

 ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया ! क्यों ?

"भीड़ मर गयी ब्रूनो नहीं मरा"हम सब को बहुत गुस्सा आता है जब हम पढते हैं कि किस तरहव् क्रूर ईसाई धर्मान्धों ने ब्रूनो को जिंदा जला दिया था ! ब्रूनो का गुनाह क्या था ? उसने सच बोला था ! उसने कहा था कि सूर्य पृथ्वी के चारों तरफ नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ घूमती है ! जबकि धर्मग्रन्थ में लिखा था कि पृथ्वी केन्द्र में है और सूर्य तथा अन्य गृह उसके चारों तरफ घुमते हैं ! ब्रूनो ने जो बोला वो सच था ! धर्मग्रन्थ में झूठ लिखा था ! इसलिए धर्मग्रंथ को ही सच मानने वाले सारे अंधे ब्रूनो के विरुद्ध हो गये ! ब्रूनो  को पकड़ कर मुकदमा चलाया गया ! अदालत ने सत्य को अपने फैसले का आधार नहीं बनाया ! अदालत भीड़ से डर गयी ! भीड़ ने कहा यह हमारे धर्म के खिलाफ बोलता है इसे जिंदा जला दो ! अदालत ने फ़ैसला दिया इसे ज़िंदा जला दो क्योंकी इसने लोगों की धार्मिक आस्था के खिलाफ बोला है ! सत्य हार गया आस्था जीत गयी! जिंदा जला दिया गया ब्रूनो , सत्य बोलने के कारण !आज भी जब हम ये पढते हैं तो सोचते हैं कि काश तब हम जैसे समझदार लोग होते तो ऐसा गलत काम न होने देते ! लेकिन अगर मैं आपको बताऊँ कि ऐसा आज भी हो रहा और आप इसे होते हुए चुपचाप देख भी रहे हैं तो भी क्या आप में इसका विरोध करने का साहस है ? आप अपनी तो छोडि़ये इस देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी ये साहस नहीं है ! न्यायालय के एक नहीं अनेकों निर्णय ऐसे हैं जो सत्य के आधार पर नहीं धर्मान्ध भीड़ को खुश करने के लिए दिये गये हैं !पहला उदाहरण है अमरनाथ के बर्फ के पिंड को शिवलिंग मानने के बारे में स्वामी अग्निवेश के बयान पर उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की फटकार ! दो-दो जिला अदालतों द्वारा अग्निवेश के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिये गये ! वो बेचारे ज़मानत के लिए भटकते घूमे ! स्वामी अग्निवेश ने कौन सी झूठी बात कही भाई ! क्या ये विज्ञान सम्मत बात नहीं है कि उस तापमान पर अगर पानी टपकेगा तो पिंड के रूप में जम ही जायेगा ! अगर डरे हुए करोडों लोग उस पिंड को भगवान मानते है तो इससे विज्ञान अपना सिद्धांत तो नहीं बदल देगा ! या तो बदल दो बच्चों की विज्ञान की किताबे! या फिर कहने दो किसी को भी सच बात ! उन्हें इस सच को कहने के लिए पीटा गया ! उनकी गर्दन काट कर लाने के लिए एक धार्मिक संगठन ने दस लाख के नगद इनाम की घोषणा कर दी ! ज्यादातर राजनैतिक पार्टी इस बात के लिए नहीं बोली ! उनको इन्ही धर्मान्धों के वोट चाहिए ! सबसे ज्यादा गुस्से की बात ये है कि इसी युग में, इसी साल इसी मामले पर इसी देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वामी अग्निवेश को फटकार लगाईं !भयंकर स्थिति है ! सच नहीं बोला जा सकता ! विज्ञान बढ़ रहा है ! विज्ञानका उपयोग हथियार बनाने में हो रहा है ! विज्ञान की खोज, टीवी का इस्तेमाल लोगों के दिमाग बंद करने में किया जा रहा है ! लोगों को भीड़ में बदला जा रहा है !भीड़ की मानसिकता को एक जैसा बनाया जा रहा है ! जो अलग तरह से बोले उसे मारो या जेल में डाल दो ! अलग बात बोलने वाला अपराधी है !सच बोलने वाला अपराधी है !ये मस्जिदें तोड़ने वाली भीड़, ये दलितों की बस्तियां जला देने वाली भीड़, ये आदिवासियों को नक्सली कह कर उनका दमन कर उनकी ज़मीने छीनने वाली भीड़, जो दंतेवाड़ा से अयोध्या तक फ़ैली है , वही भीड़ संसद में दाखिल हो गयी है ! वो कुर्सियों पर बैठ गयी है ! वो सोनी सोरी मामले मेंअत्याचारी पुलिस का साथ दे रही है ! वो गुजरात में मोदी का साथ दे रही है ! वो तर्क को नहीं मानेगी , इतिहास को नहीं मानेगी !ये भीड़ राजनीति को चलाएगी ! विज्ञान को जूतों तले रोंद देगी ! कमजोरों को मार देगी !और फिर ढोंग करके खुद को धर्मिक , राष्ट्रभक्त और मुख्यधारा कहेगी !मैं खुद को इस भीड़ के राष्ट्रवाद , धर्म और राजनीति से अलग करता हूं ! मुझे इसके खतरे पता हैं ! पर मैंने इतिहास में जाकर जलते हुए ब्रूनो के साथ खड़े होने का फ़ैसला किया है ! मुझे पता है मेरा अंत उससे ज्यादा बुरा हो सकता है ! पर देखो न भीड़ मर गयी ब्रूनो नहीं मरा !

सुदीप बनर्जी

 स्वर्गीय कवि सुदीप बनर्जी ने यह कविता भोपाल गैस त्रासदी के संदर्भ में लिखी थी।आज भी यह कितनी प्रासंगिक है,जैसे आज पर हो:


इतनी इतनी बड़ी मौतों के बाद भी

इतनी बड़ी चुप्पी, ऐसा पहरावा

ऐसा चालचलन


 उड़ते हुए आना, उड़ते हुए चले जाना

 कुछ आंकड़ों के मांसल टुकड़े बीन कर चले जाना


 मैंने देखा है ऐसों को अक्सर

 सब बेखबर है़ंं

अपने-अपने धंधों में मशगूल


 इतनी तबाही के बाद इतना बड़बोलापन 

 इतने जन्मोत्सव, इतने इश्तेहार 


हम सब समकालीन हैं, इन सबके हमराह 

जरायमपेशे में या चश्मदीद

खामोशी के गुनाहगार 


पर और भी हैं जो अभी शाया नहीं सड़कों पर

पूरी तरह हरकत में तो नहीं पर जमींदोज भी नहीं 


अभी कोई नहीं सुन रहा है

कोई नहीं सुन रहा है उन्हें

उनका जोर- जोर से चुप रहना 

धीरे-धीरे चिल्लाना।

गलत दावे 

 गलत दावे 

भाजपा सरकार लगातार दावा कर रही है कि दलितों की स्थिति में सुधार हो रहा है, दलित उत्पीड़न की घटनाओं में कमी आई है। सफाई कर्मियों के पांव धोकर, अंबेडकर की तस्वीर और अन्य प्रतीकों का इस्तेमाल करके तरह-तरह से भाजपा दलित हितैषी होने का दावा कर रही है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। 


राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार नें सदन में दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों के बारे में गृह मंत्रालय से सवाल पूछा। जिसका लिखित जवाब 20 जुलाई 2022 गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने दिया। 


उन्होंने अपने जवाब में पिछले पांच सालों के जो आंकड़े दिये हैं वो चौंकाने वाले हैं और दलितों को लुभाने वाले सरकारी प्रोपगेंडा की पोल खोल कर रख देते है। आइये, इन आंकड़ों की नज़र से देखते हैं कि देश में पिछले पांच सालों में दलित उत्पीड़न की क्या स्थिति रही है। 


पिछले पांच सालों में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध में 23% बढ़ोतरी 


गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय द्वारा राज्यसभा में दिये गये लिखित जवाब के अनुसार वर्ष 2016 में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 40,801 मामले दर्ज़ किय गये थे, 2017 में 43,203, वर्ष 2018 में 42,793, वर्ष 2019 में 45,961 और 2020 में ये संख्या बढ़कर 50,291 हो गई। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि पिछले पांच सालों में दलितों के खिलाफ अपराध के मामलों में साल दर साल लगातार बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2016 में जहां कुल अपराधों की संख्या 40,801 थी, वहीं 2020 में बढ़कर 50,291 हो गई। यानी पिछले पांच सालों में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में 23% बढ़ोतरी हुई है। ये काफी चिंताजनक स्थिति है और सरकार के दलित हितैषी होने के तमाम दावों और प्रोपगेंडा की पोल खोल कर रख दे रही है। 


दलित महिलाओं के रेप के मामलों में 33% वृद्धि 


गौरतलब है कि दलितों में भी दलित स्त्री तथाकथित सवर्णों की ताकत और जाति व्यवस्था का सबसे नृशंस रूप भुगतती हैं। दलित स्त्री के शरीर को मर्दानगी, श्रेष्ठता, ताकत दिखाने के साथ-साथ मौज-मजा करने, सबक सिखाने और बदला लेने के लिए एक मैदान की तरह देखा जाता है। पिछले पांच सालों में दलित महिलाएं भयानक क्रूरता का सामना कर रही हैं। राज्यसभा में पेश किये गये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि पिछले पांच सालों में दलित महिलाओं के साथ रेप के मामलों में साल दर साल लगातार बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2016 में दलित महिलाओं के रेप के 2,541 मामले दर्ज़ किये गये थे, वर्ष 2017 में 2,714, वर्ष 2018 में 2,936, वर्ष 2019 में 3,484 और वर्ष 2020 में 3,372 मामले दर्ज़ किये गये हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच सालों में दलित महिलाओं के रेप के मामलों में लगभग 33% बढ़ोतरी हुई है। यानी एक-तिहाई बढ़ोतरी दर्ज़ की गई है। हर रोज 9 दलित महिलाओं के रेप के मामले दर्ज़ होते हैं। 


न्याय में देर और अंधेर 


सबसे पहले तो हमें ये समझना होगा कि ये संख्या मात्र उन मामलों की है जो पुलिस तक पहुंच पाते हैं। ऐसे बहुत से मामले होंगे जो दबा दिये जाते हैं और दर्ज़ नहीं हो पाते हैं। हमें ये भी देखने की ज़रूरत है कि जो मामले दर्ज़ होते हैं उनकी स्थिति क्या है? क्या सचमुच पीड़ितों को न्याय मिलता हैं? वर्ष 2020 में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 50,291 मामले दर्ज़ किये गये थे जिनमें से मात्र 3,241 मामलों में ही सजा सुनाई गई है। यानी मात्र 6% मामलों में ही सजा हुई है। यही स्थिति दलित महिलाओं के रेप के मामलों की है। वर्ष 2020 में दलितों महिलाओं के रेप के कुल 3,372 मामले दर्ज़ किए गये। जिनमें से मात्र 2,959 मामलों में ही चार्ज़शीट पेश की गई और सिर्फ 225 मामलों में ही सज़ा सुनाई गई। यानी मात्र 6% मामलों में। ये आंकड़ा पुलिस प्रशासन से लेकर न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठा रहा है और तमाम सरकारी दावों की पोल खो रहा है। 


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं।) 


 

हमें तो ताश खेलने से ही फुर्सत नहीं है

 हमें तो ताश खेलने से ही फुर्सत नहीं है

रणबीर

हरियाणा में आज के दिन महिलाओं की जिंदगी तनाव , असुरक्षा , अभाव और असहायता मतलब लाचारी में डूबती जा रही लगती है।

दूसरी तरफ हम कह सकते हैं कि महिलाओं ने खेलों में तम्बू गाड़ दिए । ठीक ।  पर वे इस कारण नहीं गाड़ पाई कि हमने गावों में खेलने कूदने  का उनके लिए कोई बेहतर माहौल बना कर दिया हो , वे अपनी लग्न और अपनी खुबात  से जीत कर लाई हैं मैडल ।  महिला के एक हिस्से का जहां असरशन बढ़ा है वहीं दूसरी ओर औरत पर शिकंजा और मजबूत होता जा रहा लगता है हरियाणा में।  महिला भ्रूण हत्या , दहेज़ हत्या , इज्जत के नाम पर हत्या का ग्राफ ऊपर की तरफ ही जाता दिखाई दे रहा है। यौन उत्पीड़न ,बलात्कार , छेड़ छाड़ ,डराना-धमकाना ,घरेलू हिंसा ,औरतों का अपमान , असुरक्षा और घुटन इस हद तक बढ़ गये कि नेताओं  ने और लोगों ने यूं मान लिया कि ये तो आम बात हैं । 

        कुछ आंकड़े  राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के भी इसी की पुष्टि करते हुए लगते हैं।

1.लिंग अनुपात 926 है यानी 926 महिलाएं हैं प्रति 1000 पुरुषों पर। 

2. लिंग अनुपात पिछले 5 साल में जन्म के वक्त है--893

3. 20 से 24 साल की महिलाएं जिनकी 16 साल से कम उम्र में शादी हुई-12.5%

4. सीजेरियन सेक्शन से डिलीवरी का प्रतिशत 2015-16 में 11.7% था जो अब 19.7% हो गया।

5.15 से 49 साल की महिलाएं जी एनीमिक हैं--60.4%

6. 18.2% महिलाएं (18 से 49 साल )  हैं जिन्होंने स्पॉउज वायलेंस झेली है--18.2%

7. हरियाणा में साल-दर साल बढ़ रही बलात्कार की घटनाएं,पिछले 8 वर्षों में 2021 में सर्वाधिक 1546 बलात्कार के मामले हुए दर्ज।

8. एनसीआरबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि हरियाणा में, महिलाओं के खिलाफ अपराध में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 2020 में 13,000 से बढ़कर 2021 में 16,658 हो गई है।

9. राज्य ने नाबालिग लड़कियों (आईपीसी की धारा 366 ए) की खरीद के 992 मामले दर्ज किए, जिनमें 1,099 पीड़ित थे। यहां भी, राज्य प्रति लाख जनसंख्या पर 7.1 मामलों की अपराध दर के साथ देश में शीर्ष पर है।



आर्थिक संकट आज दरवाजे पर आकर  खड़ा हो गया और परिवार टूटते नजर आते हैं।  जीवन के साफ़ सुथरे साधन बचे नहीं तो खुली छिप्पी वैश्यावृति की तरफ भी औरत हर जगह धकेली जा रही हैं ऐसा भी सुनने में आ रहा है ।

    अराजकता और मनमानेपन का जो माहौल यहां बणा दिया गया है उसमें महिलाओं को 'सस्ते मैं उपलब्ध और'आसानी तैं उपलब्ध शिकार'  के  रूप मैं देखा जाता है । इस आर्थिक असमानता और सामजिक  असमानता के चलते ताकतवर तबके महिलाओं के साथ कुछ भी और किसी भी हद तक पता नहीं कितना घृणित काम कर सकते हैं ।  कुल मिला कर सौ का तोड़ ये है कि महिलाओं का अवमूल्यन हुआ है ।

     गरीब से गरीब तबकों में भी उनके अपने समुदाय और परिवार के बीच में  महिलाओं पर अत्याचार बढ़े हैं । औरतों को ' क्षणिक मजे की चीज ' की तरह देखना और इस तथाकथित मजे के लिए इन औरतों को मौका लगते की साथ घेर लेना बड़ी आसान और आम बात हो गई । पिछले दिनों मैं हरियाणा में परित्यक्ताओं और औरतों के साथ संबंधों मैं धोखाधड़ी बहोत बधी है।  ब्याह के कुछ दिन बाद ही लड़कियों पर हिंसा बढ़ी है और क़त्ल और आत्म हत्या के केस सामने आ रहे हैं ।

    दूसरी तरफ लिंग अनुपात मैं विषमता के कारण लड़कियां दूर दूर से खरीद कर लाई जा रही हैं और औरत पसंद नहीं आये तो उसको वापिस छोड़ आये और उसकी बहण को  ले आये उसकी जगह ,ऐसी घृणात्मक बातें भी सुनने में आती रही हैं । एक दौर के बादअब तो औरतों के खरीद फरोख्त के धंधे मैं दलाल भी पैदा हो गए सुनते हैं ।  ये खरीद फरोख्त तेजी  से रफ़्तार पकड़ रही है और औरतों के हक़ में आवज उठाने  वाली   जनवादी महिला समिति जैसी संस्थाएं बहोत थोड़ी हैं ।  

      हरियाणा के समाज मैं संघर्ष करने वाली महिलाओं के लिए 'स्पोर्ट सिस्टम 'की बहोत कमी है ।  जितनी सामाजिक असुरक्षा बढ़ती जा रही है उसके हिसाब से यूं एक दो नारी निकेतन का मामला कोणी रह रहा।   परित्यक्ताओं , एकल माओं ,अविवाहित महिलाओं ,यौन उत्पीड़न की शिकार  महिलाओं ,बच्चियों की  जरूरतों का ध्यान रख कर और सोच  समझ कर समाज में उनका स्थान बनाना बहोत जरूरी हो गया है। शार्ट स्टे होम , कामकाजी महिला हॉस्टल ,लड़कियों के हॉस्टल , मुफ्त जच्चा बच्चा केंद्र , कानूनी सहायता केंद्र , सलाह केंद्र, तनाव मुक्ति केंद्र , मनो-चिकित्सा केंद्र, कौशल विकसित करने वाले कार्यक्रम , एकल माओं के बच्चों की शिक्षा के लिए अनुदान और कर्ज की सुविधा , महिला स्वास्थ्य केंद्र , व्यायाम शालायें , सामूहिक रसोईघर , की मांग जरूरी हो गई हैं। हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए कानून और स्वास्थ्य से संबंधित आपातकालिक व जल्द सेवाओं की मांग गम्भीरता से  समाज मैं उठानी बहोत जरूरी हो गई और इस के लिए कुछ संस्थाएं सक्रिय भी हैं । जो भी जहां है उसे इस स्पोर्ट सिस्टम को खड़ा करने में अपना योगदान जरूर करणा चाहिए ।  इसके साथ साथ सरकार पर भी दबाव बढ़ाना चाहिए इस स्पोर्ट सिस्टम के विकास के लिये।

   हरियाणे में पढ़े लिखे लोगों में लिंग अनुपात एक हजार पुरुषों पर छह सौ सतरह महिलाओं का पहोंच गया था कुछ साल पहले । अभी भी 926 ही है। आम जन में यह अनुपात 1000 पुरुषों पर 877 महिलाओं का ही है आज के दिन। यह खतरे की घंटी बजी रही है हरियाणा में । पर लोगों को ताश खेलने से फुर्सत नहीं , या बणी की दो सो गज जमीन पर कब्ज़ा करने की जुगाड़ बाजी में हैं । इन सारी  बातों पर गांव और शहर की महिलाओं को और पुरुषां  को गंभीरता से विचार करने  की जरूरत है।

रणबीर सिंह दहिया

एआईपीएसएन और एनसीओए-सीपीएसई अवधारणा नोट  परिचय

 एस एंड टी आत्मनिर्भरता पर संगोष्ठी 

12 और 13 नवंबर, 2022 

दिल्ली विज्ञान मंच 

एआईपीएसएन और एनसीओए-सीपीएसई अवधारणा नोट 

परिचय

स्वतंत्र भारत ने आत्मनिर्भर विकास के रास्तों के अवलोकन के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी (एस एंड टी) पर आधारित औद्योगीकरण और विकास के पथ पर अग्रसर किया। आत्मनिर्भरता की यह नीति दूसरी पंचवर्षीय योजना, औद्योगिक नीति संकल्प और विज्ञान नीति संकल्प में व्यक्त की गई थी, जो नए स्वतंत्र देशों में अद्वितीय थी। ये नीतियां स्वतंत्रता से पहले भी राष्ट्रीय आंदोलन द्वारा परिकल्पित नियोजित विकास की प्रक्रिया के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थीं, और बाद में योजना आयोग के माध्यम से लागू की गईं।

         सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों ने अर्थव्यवस्था के "मुख्य क्षेत्रों" में और अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में और कुछ हद तक रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। निजी क्षेत्र पूरी तरह से औद्योगीकरण के इस पथ पर सवार था, जैसा कि उद्योग के कप्तानों द्वारा तैयार की गई 1948 की तथाकथित बॉम्बे योजना में चित्रित किया गया था। यह कुछ "नेहरूवादी समाजवादी" साजिश नहीं थी जैसा कि अक्सर आरोप लगाया जाता है, लेकिन निजी क्षेत्र द्वारा "मुख्य क्षेत्र" को राज्य पर छोड़ने के लिए सहमति व्यक्त की गई थी क्योंकि केवल बाद वाले के पास आवश्यक पूंजी और क्षमताएं थीं, जबकि निजी क्षेत्र द्वारा उपभोक्ता वस्तुओं और प्रकाश इंजीनियरिंग पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। 

           भारतीय राज्य ने स्पष्ट रूप से प्राकृतिक संसाधनों को विकसित करने और एस एंड टी क्षमताओं को उन्नत करने का लक्ष्य रखा, विशेष रूप से औद्योगिक अनुसंधान और उच्च शिक्षा के प्रमुख संस्थानों के लिए प्रयोगशालाओं के एक नेटवर्क की स्थापना के माध्यम से, संतुलित औद्योगिक विकास और एस एंड टी में आत्मनिर्भरता की उपलब्धि के लिए। इन और अन्य उपायों के माध्यम से, 1970 के दशक तक, भारत जापान को छोड़कर अधिकांश एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ औद्योगिक दृष्टि से लगभग बराबर था।

            अस्सी के दशक के मध्य से भारत में आत्मनिर्भर विकास, सार्वजनिक क्षेत्र और सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों के लिए योजना प्रक्रिया का धीरे-धीरे कमजोर होना और एस एंड टी की परियोजना के लिए समर्थन कमजोर होना देखा गया। इस बीच दक्षिण कोरिया, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों ने तेजी से भारत को औद्योगिक, सामाजिक-आर्थिक रूप से और साथ ही एस एंड टी क्षमताओं में पीछे छोड़ दिया।

        युद्ध के बाद जापान द्वारा पहले लिए गए मार्ग का अनुसरण करते हुए, राज्य ने रणनीतिक रूप से चयनित क्षेत्रों में एस एंड टी और औद्योगिक क्षमताओं में निवेश करने वाले प्रमुख कॉर्पोरेट घरानों के साथ साझेदारी में, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑप्टिक्स, ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में प्रौद्योगिकियों, उत्पादों और ब्रांडों में वैश्विक नेतृत्व की स्थिति स्थापित की। सेमी-कंडक्टर, उन्नत मशीन टूल्स, भारी मशीनरी, रोबोटिक्स और मास मैन्युफैक्चरिंग, और जल्द ही कंप्यूटर, सेल फोन आदि में। चीन की तीव्र प्रगति, शुरू में निर्यात-उन्मुख बड़े पैमाने पर निर्माण में बाद में प्रौद्योगिकियों के राज्य समर्थित अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर विकास में विकसित  और रिवर्स इंजीनियरिंग और स्वदेशी आरएंडडी सहित उत्पादों को थोड़ा दोहराव की आवश्यकता है यह सोच बनी। चीन ने अब भविष्य की उन्नत तकनीकों जैसे 5G, IoT, AI, इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी, सौर ऊर्जा, बायो-फार्मा आदि में 2035 तक वैश्विक नेतृत्व की दिशा में R&D और औद्योगिक विकास की एक नियोजित रणनीति की घोषणा की है।

        1990 के दशक के बाद से, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) के युग के दौरान, भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना और विदेशी निवेश को उन्नत तकनीकों में लाना था,   आत्म निर्भरता-सम्बन्धी "पुरानी" व अप्रासंगिक अवधारणा माना जाता था उससे निकालकर। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हुआ है।

    बहुराष्ट्रीय कंपनियों और घरेलू निजी क्षेत्र को दिए गए सभी प्रोत्साहनों के बावजूद, भारतीय उद्योग द्वारा उन्नत प्रौद्योगिकियों का कोई महत्वपूर्ण समावेश नहीं किया गया है। कोई उल्लेखनीय स्वदेशी आर एंड डी, उल्लेखनीय भारतीय उत्पाद नहीं हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्नत बाजारों में अपनी पहचान बनाई है। 

   "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" के नवीनतम विकास उन्मुख मार्ग यह मानते हैं कि आत्मनिर्भर विकास कुलीन वर्गों और व्यापार मार्ग में आसानी, यहां तक ​​कि प्रौद्योगिकी अवशोषण और स्वदेशी आर एंड डी की अनुपस्थिति में, जो निजी क्षेत्र के साथ जीडीपी के 1% से भी कम योगदान देता है, और यहां तक ​​​​कि पीएसयू के निरंतर कमजोर पड़ने या एकमुश्त निजीकरण के साथ भी, और राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं के अनुकरण यानी नकल आदि से प्राप्त किया जा सकता है।

      एशियाई वित्तीय संकट के बाद के युग में, नव-उदारवादी मॉडल में विश्वास बढ़ा और पूंजीवाद माल और पूंजी के मुक्त प्रवाह के माध्यम से सभी राष्ट्र राज्यों को एकीकृत करने में सक्षम था। हालाँकि 2000 के दशक में चीन के आर्थिक विकास के आलोक में, यह दावा करना कठिन हो गया है कि उदार बाजार पूंजीवाद ही विकास का एकमात्र मार्ग है। वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था भी कुछ तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है।

      पूर्वी एशिया के भीतर प्रतिस्पर्धी आर्थिक संबंधों के लिए जापान को शक्ति संबंधों में बदलाव के रूप में प्रतिस्पर्धा और सहयोग के लिए नए दृष्टिकोणों के संयोजन के साथ देश और विदेश में प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है। चीन के उदय के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका एशिया में ऑफ-शोरिंग मैन्युफैक्चरिंग को वापस कर रहा है। रूस और चीन दोनों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के आकस्मिक संघर्ष के कारण अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध पुनर्व्यवस्था की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।

          पूंजीवादी विकास के रास्ते न केवल जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संक्रमण के कारण बल्कि बढ़ती असमानता और नस्लीय / जातीय / धार्मिक तनावों के कारण भी वैश्विक दबाव और तनाव में हैं। सत्तावादी लोकलुभावनवाद (ओं) औद्योगिक और विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (एसटीआई) नीतियों और वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों, सामाजिक वैज्ञानिकों और राजनीतिक और नागरिक समाज के नेताओं के सामाजिक एम्बेडिंग को विकास के लिए अनुसंधान और प्रौद्योगिकी की उभरती दिशाओं पर सामूहिक रूप से प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है।


        उद्देश्यों 

सवाल यह है कि भारतीय राज्य तंत्र और समाज किन परिस्थितियों में आत्मनिर्भर औद्योगिक और कृषि विकास, रोजगार सृजन, पर्यावरण और जलवायु अनुकूल शहरीकरण, सिर्फ ऊर्जा संक्रमण और कई चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटने में सक्षम नीतियों को अपनाने और इस तरह के और बदलाव के लिए तैयार होगा। 

      इस संगोष्ठी में हम खुद से पूछेंगे कि किस तरह की औद्योगिक नीति और विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (एसटीआई) नीतियों से भारतीय समाज वर्तमान समय में सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम औद्योगिक परिवर्तन को आगे बढ़ाने में सक्षम होगा।  संगोष्ठी एस एंड टी आत्मनिर्भरता और नियोजित आर्थिक विकास की धारणा को बेहतर ढंग से समझने और भविष्य की समस्याओं से निपटने के लिए नीतियों पर विचार-विमर्श करने का प्रयास करती है। संगोष्ठी केंद्र सरकार द्वारा प्रतिपादित "आत्मनिर्भर भारत" के वर्तमान पथ का आकलन करने का भी प्रयास करती है, जो अब लगभग तीन वर्षों से लागू है और अभी भी एक नव-उदार नीति ढांचे के भीतर अपने लक्ष्यों को बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में  प्राप्त करने की उम्मीद है रखता है। 

       एक वैश्वीकृत औद्योगिक दृष्टिकोण के साथ जहां प्रौद्योगिकियों और निवेश को उन देशों में प्रवाहित किया जाता है जो व्यापार में आसानी के माध्यम से निवेश के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर सकते हैं, भारत वास्तव में क्या हासिल कर सकता है या खो सकता है, यह वह प्रश्न है जिसकी अवधारणात्मक और क्षेत्रवार जांच की जानी चाहिए। संगोष्ठी मोटे तौर पर आत्मनिर्भर विकास के लिए भारत के मार्गों के इतिहास का पता लगाएगी। यह जांच करेगा कि भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था में एक स्वायत्त स्वदेशी एस एंड टी और औद्योगिक क्षमता विकसित करने का प्रयास कैसे किया, जहां सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र अंततः संघर्ष में आ गए और उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त किया। 


      संगोष्ठी में विचार-विमर्श रोजगार को बनाए रखने में सक्षम भविष्य के मार्गों के विकास की चुनौतियों को भी लक्षित करेगा, चौथी "औद्योगिक क्रांति", ऊर्जा, पर्यावरण, गतिशीलता और शहरी विकास के क्षेत्र में सामाजिक-तकनीकी परिवर्तन और राष्ट्र राज्य को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील आबादी की रक्षा करने 




में सक्षम बनाना।

भारत वास्तव में किसका है?* 

 *भारत वास्तव में किसका है?* 


*(भारत का इतिहास) =*

*अंत तक पढ़ने लायक।* 


गोरी साम्राज्य से नरेंद्र मोदी तक 


*गोरी साम्राज्य* 


  1 = 1193 मोहम्मद गौरी

  2 = 1206 कुतुबुद्दीन ऐबकी

  3 = 1210

  4 = 1211

  5 = 1236 रकिनुद्दीन फ़िरोज़ शाह

  6 = 1236 रज़ा सुल्तान

  7 = 1240 मोजद्दीन बहराम शाह

  8 = 1242 अल-दीन मसूद शाह

  9 = 1246 नसीरुद्दीन महमूदी

  10 = 1266 गयासुद्दीन बलबीन

  11 = 1286............

  12 = 1287 मस्जिद के कबड्डी

  13 = 1290 शमसुद्दीन कमर

  महान साम्राज्य का अंत

  (सरकार से दूर -97 वर्ष लगभग।) 


  *खलजी साम्राज्य* 


  1 = 1290 जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी

  2=1292 अलाउद्दीन खिलजी

  4=1316 शहाबुद्दीन उमर शाह

  5 = 1316 कुतुबुद्दीन मुबारक शाह

  6 = 1320 नसीरुद्दीन खुसरो शाह

  खिलजी साम्राज्य का अंत

  (दूर सरकार -30 वर्ष लगभग) 


  *तुगलक साम्राज्य* 


  1 = 1320 गयासुद्दीन तुगलक (प्रथम)

  2 = 1325 मोहम्मद इब्न तुगलक (द्वितीय)

  3 = 1351 फिरोज शाह तुगलक

  4 = 1388 गयासुद्दीन तुगलक (द्वितीय)

  5 = 1389 अबू बकर शाह

  6 = 1389 मोहम्मद तुगलक (सोम)

  7 = 1394....... (मैं)

  8 = 1394 नसीरुद्दीन शाह (द्वितीय)

  9=1395 नुसरत शाह

  10 = 1399 नसीरुद्दीन मोहम्मद शाह (द्वितीय)

  11 = 1413 सरकार

  तुगलक साम्राज्य का अंत

  (सरकार से दूर -94 वर्ष लगभग।) 


  *सईद वंश* 


  1 = 1414 पाम खान

  2 = 1421 मुइज़ुद्दीन मुबारक शाह (द्वितीय)

  3 = 1434 मुहम्मद शाह (चतुर्थ)

  4 = 1445 अल्लाह आलम शाह

  सईद साम्राज्य का अंत

  (दूर सरकार-37 वर्ष लगभग) 


  *लोधी साम्राज्य* 


  1 = 1451 बहलोल लोधी

  2 = 1489 लोधी (द्वितीय)

  3 = 1517 इब्राहीम लोधी

  लोधी साम्राज्य का अंत

  (दूर सरकार-75 वर्ष लगभग) 


*मुगल साम्राज्य* 


  1 = 1526 जहीरुद्दीन बाबरी

  2 = 1530 हुमायूँ

  मुगल साम्राज्य का अंत 


  *सुरियन साम्राज्य* 


  1 = 1539 शेर शाह सूरी

  2 = 1545 इस्लाम शाह सूरी

  3 = 1552 महमूद शाह सूरी

  4 = 1553 अब्राहम सूरी

  5 = 1554 परवेज शाह सूरी

  6 = 1554 मुबारक खान सूरी

  सुररियन साम्राज्य का अंत

  (दूर सरकार-16 साल लगभग) 


*मुगल साम्राज्य फिर से* 


  1 = 1555 हुमायूँ (फिर से)

  2=1556 जलालुद्दीन अकबर

  3 = 1605 जहांगीर

  4 = 1628 शाहजहाँ

  5 = 1659 औरंगजेब

  6 = 1707 शाह आलम (प्रथम)

  7 = 1712 बहादुर शाह

  8 = 1713

  9 = 1719

  10 = 1719 …………………

  11 = 1719 …………………

  12 = 1719 महमूद शाह

  13 = 1748 अहमद शाह

  14 = 1754

  15 = 1759 शाह आलम

  16 = 1806 अकबर शाह

  17 = 1837 ज़फ़री

  मुगल साम्राज्य का अंत

  (सरकार से दूर-315 वर्ष लगभग।) 


  *ब्रिटिश राज* 


  1 = 1858 लॉर्ड किंग

  2 = 1862 लॉर्ड जेम्स ब्रूस एल्गिन

  3 = 1864 लॉर्ड जे. लॉरेंस

  4 = 1869 लॉर्ड रिचर्ड मेयो

  5 = 1872 लॉर्ड नार्थबक

  6 = 1876 लॉर्ड एडवर्ड लैटिन

  7 = 1880 लॉर्ड जॉर्ज रिपोन

  8 = 1884 लॉर्ड डफरिन

  9 = 1888 लॉर्ड हनी लेसडन

  10 = 1894 लॉर्ड विक्टर ब्रूस एल्गिन

  11 = 1899 लॉर्ड जॉर्ज कोरजेन

  12 = 1905 लॉर्ड गिल्बर्ट मिंटो

  13 = 1910 लॉर्ड चार्ल्स हार्डगे

  14 = 1916 लॉर्ड फ्रेडरिक से राजकोष तक

  15 = 1921 लॉर्ड रक्स अजाक रिडिगो

  16 = 1926 लॉर्ड एडवर्ड इरविन

  17 = 1931 लॉर्ड फर्मन वेल्डन

  18 = 1936 लॉर्ड एलेजांद्रा लिनलिथगो

  19 = 1943 लॉर्ड आर्चीबाल्ड व्हील

  20 = 1947 लॉर्ड माउंट बैटन 


  ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंत 


  *भारत का प्रधान मंत्री* 


  1 = 1947 जवाहरलाल नेहरू

  2 = 1964 गोलजारी लाल नंदा

  3 = 1964 लाल बहादुर शास्त्री

  4 = 1966 गोलजारी लाल नंदा

  5 = 1966 इंदिरा गांधी

  6 = 1977 मोरारजी देसाई

  7 = 1979 चरण सिंह

  8 = 1980 इंदिरा गांधी

  9 = 1984 राजीव गांधी

  10 = 1989 वी पी सिंह

  11 = 1990 चंद्रशेखर

  12 = 1991 पी.वी.  नरसीमा राव

  13 = 1992 अटल बिहारी वाजपेयी

  14 = 1996 देवेगौड़ा

  15 = 1997 आई.के.  गुजराल

  16 = 1998 अटल बिहारी वाजपेयी

  17 = 2004 मनमोहन सिंह

  18=2014 नरेंद्र मोदी 


  1000 साल तक मुस्लिम राज्य होने के बावजूद भारत में हिंदू रहते हैं।  मुस्लिम शासकों ने उनके साथ कभी अन्याय नहीं किया जब तक शासन किया भारत में न्याय और इन्साफ क़ायम रहा. 


  और .... 


  हिंदुओं को अब तक 100 साल भी नहीं हुए हैं और वो मुसलमानों को खत्म करने की बात करते हैं !!

   यह जानकारी छात्रों को दी जानी चाहिए और इस पोस्ट को सभी के साथ साझा करना चाहिए।  क्योंकि आजकल 90% लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।

डॉ.बाबा सहाब अम्बेडकर

ने कहा था कि जो लोग अपना इतिहास नहीं जानते वो लोग अपना भविष्य नहीं बना सकते

और अगर किसी क़ौम को खत्म करना हैं तो उस कौम का इतिहास खत्म कर दो वो कौम खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं

असलम सैय्यद वॉइस प्रेसिडेंट एस डी पी आई (SDPI)पुणे,महाराष्ट्र

नेहरू विरोध की जड़ें

 नेहरू विरोध की जड़ें

अविजीत पाठक (समाज शास्त्री) (पंजाबी ट्रिब्यून, चंडीगढ़)

अनुवाद: वंदना सुखीजा, गुरबख्श सिंह मोंगा

जैसे देश के एक प्रमुख मीडिया घराने के हाल ही में करवाए गए सर्वे में ‘देश का मिजाज’ दिखाया गया है और हमें यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत ही स्वीकार्य है I जैसे हमें बताया गया है मोदी इस देश के अब तक के सबसे ‘बेहतरीन’ प्रधानमंत्री हैं और वह अन्य सारे प्रधानमंत्रियों पर छाए हुए हैं I सचमुच हम इस समय ‘मोदी के जमाने’ में रह रहे हैं, सर्व-व्यापक मोदी अंतर्राष्ट्रीय रहनुमा के तौर पर चारों ओर घूम रहे हैं अपने खास नाटकीय अंदाज़ के साथ तकरीरें करते हुए हर तरह की चीजों से वादे करते हुए तथा अन्य हर किसी को तुच्छ और महत्वहीन बनाते हुए अपने साथी मंत्रियों तक को I 

इसके बावजूद एक प्रश्न लगातार हमें परेशान कर रहा है I मोदी के इस साधारण से कहीं बड़े अक्स के बावजूद क्या कारण है कि सत्तारूढ़ पक्ष (और हां, साथ ही इसके साथ जुड़ी हुई प्रचार मशीनरी) कभी भी जवाहरलाल नेहरू की बेइज्जती करने या उनकी कद्र कम करने से थकता-अकता नहीं I ऐसा क्यों है कि कर्नाटक सरकार अपने मीडिया इश्तिहार में स्वाधीनता सेनानियों की सूची में से नेहरू का नाम हटाने तक के बारे में सोचती है? अथवा फिर यह कह लें कि ऐसा क्यों है कि एक हिंदी टेलीविज़न चैनल को (एक बार फिर आंकड़ों के रहस्य के साथ) के द्वारा दावा करना पड़ता है कि राष्ट्र के द्वारा नेहरू को सबसे बुरा प्रधानमंत्री माना जाता है?

क्या आत्म-प्रशंसा में कुछ स्वयं-विरोधी है? तुम जितने ज्यादा ताकतवर होते जाते हो, उतना ही ज्यादा असुरक्षित महसूस करते हो! अथवा नेहरू बारे कुछ तो ऐसा है जो सत्तारूढ़ पक्ष को लगातार तंग करता है? नहीं तो हम यह कैसे समझ सकते हैं कि चिरकालिक ‘नेहरू ईर्ष्या’ को क्या माना जाए?

बात शुरू करने से पहले मुझे नेहरू के बारे में तीन नुक्ते साफ करने दो; राजनेता की तरह उनका करिश्मा, उनकी बौद्धिक गहराई, महात्मा गांधी के साथ उनका रिश्ता और इस सबसे बढ़ कर उनकी तरफ से शुरू किया गया राष्ट्र निर्माण का कार्य I

पहला, जैसे ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (भारत एक खोज) तथा ‘एन ऑटोबायोग्राफी एंड ग्लाइंपसेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ (एक स्वै-जीवनी और विश्व इतिहास की झलक) का कोई भी जागरूक पाठक यह बात जरूर मानेगा कि नेहरू सचमुच चिंतक-दार्शनिक थे I उनकी समझ में उनको मानवीय इतिहास के विकास - ज्ञान के दौर में साइंस, सभ्याचार और राजनीति में अहम इंकलाबों आदि का एहसास करने के काबिल बनाया; उनकी आश्चर्यचकित होने की भावना ने उनकी आंखें खोल दी; वह आंखें जो भारतीय सभ्यता की  संवेदनाओं को देख, महसूस और इस का एहसास कर सकती थी; और गहरी सभ्याचारक संभावनाओं के साथ भरपूर आधुनिकता वादी होने के नाते ‘अतीत के मुर्दा वज़न’ में से बाहर आते नए भारत का सपना देख सकते थे जो ‘वैज्ञानिक स्वभाव’ को अपनाता हुआ खुद को आधुनिक भी बनाता है परंतु साथ ही उपनिषदों से पैदा हुई समझ, गौतम बुद्ध की खोज तथा हमारे पूर्वजों की दार्शनिक और कलात्मक प्राप्तियां और लगातार अंतर-धार्मिक चर्चाओं और संवाद को नहीं भूलता I

दूसरा, उनके महात्मा गांधी के साथ रचनात्मक तौर पर सूक्ष्म और गंभीर मेल-मिलाप ने उनके जिज्ञासु मन के मंथन को ज़ाहिर किया I गांधी की तरफ से आधुनिक/बेरहम सभ्यता (modern/’satanic’ civilization) संबंधी नैतिक/आध्यात्मिक आलोचना विकसित करने और ‘स्वराज’ की जैविक जरूरतों और वातावरण के साथ सद्भावना भरे रिश्ते वाली कुल मिलाकर एक बड़े स्तर पर विकेंद्रीकरण आधारित धारणा लिए हुए कोशिश करने के लिए लिखी गई संवाद भरपूर किताब ‘हिंद स्वराज’ के बुनियादी सिद्धांतों के साथ तो चाहे आधुनिकतावादी नेहरू सहमत नहीं हो सकते थे परंतु फिर भी वह गांधी से बच नहीं सके I

उधर गांधी भी उन पर भरोसा करते थे I संभवत अपने प्यार और अहिंसा की धार्मिकता के साथ गांधी भी नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के प्रति गहरी वचनबद्धता के कारण उन पर भरोसा करते थे I उन्होंने महसूस किया कि नेहरू ही बंटवारे के सदमे का शिकार और ‘दो कोमो के सिद्धांत’ के हिमायतियों की तरफ से ज़हरीले किए हुए भारत की समरसता के ज़ख्मों पर मरहम लगा सकते हैं I

तीसरा, नेहरू कल्याणकारी राज्य की जरूरत और प्रासंगिकता को हरमन प्यारा बनाने में कामयाब रहे ऐसी स्टेट/रियासत जो सामाजिक पिछड़ेपन तथा आर्थिक गैर-बराबरी की शिद्दत कम करने वाले सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के विकास के लिए वचनबद्ध हो I

सभी इंसानों की तरह नेहरू भी अपने आप में मुकम्मल नहीं थे; हालांकि यह कहना भी नादानी होगी कि वह भारत में इंकलाबी तब्दीलियां करने और सभी सामाजिक-आर्थिक ना-बराबरियों तथा जातिवादी/ पितृ-सत्तात्मक सोच का खात्मा करने में कामयाब रहे I फिर संभवत नेहरू के दौर ने भी नई तरह का कुलीन वर्ग पैदा किया तथा उसका पालन पोषण किया, जैसे पश्चिमी देशों में पढ़े हुए अर्थशास्त्री, साइंस दान, टेक्नोक्रेट, सिविल अफसरशाही आदि जो सरकारी मशीनरी को चला रहे थे तथा नई तरह के नौकरशाही ताकत का वृतांत पैदा कर रहे थे I फिर भी आजादी के लिए लड़ने वालों की तरफ से नए विचारों के साथ भरपूर बुद्धिजीवी की तरह, एक अंतरराष्ट्रीय नेता तथा इस सब से भी बढ़ कर भारत के पहले दूरदर्शी प्रधानमंत्री की तरह उन्होंने शानदार किरदार निभाया, उनको हरगिज़ नकारा नहीं जा सकता I

इसके बावजूद इन दिनों हम अपनी सांझी चेतना में नेहरू के योगदान को मिटा देने की संयोजित कोशिशें होती देख रहे हैं I दरअसल, हिंदुत्व के हिमायती कभी भी नेहरू की स्टेट/रियासत की धर्मनिरपेक्षता वाली दृष्टि के लिए वचनबद्धता के साथ आरामदेह महसूस नहीं कर सकते I तर्क की रोशनी को ही नफ़रत करने वाला ज़हरीला वातावरण हरगिज़ भी नेहरू की तीव्र समाजिक-सियासी सोच, वैज्ञानिक जज़्बे और दार्शनिक जुनून के साथ मेल नहीं खाता I भारत के जिस विचार को नेहरू ने अपनी चेतना की लचकता तथा विश्वव्यापीकरण के साथ संजोया था, वह हरगिज उस सोच के साथ मेल खाने वाला नहीं हो सकता जिसके लिए अपनी फूट डालने वाली सोच के कारण गोलवलकर और सावरकर के पैरोकार काम करते हैं I

हां, जब हिंदुत्व का ठोस जन-सभ्याचार शोर भरपूर तथा हिंसक घोषणा पत्र जैसा ज़ाहिर होता है तथा साथ ही सोशल मीडिया से लगातार चलने वाले ज़हरीले टेलीविज़न चैनलों की तरफ ऐतिहासिक तौर पर गल्त, बौद्धिक तौर पर धुंधले तथा आध्यात्मिक तौर पर कंगाली वाले संदेश प्रसारित किए जाते हैं तो हर किसी को प्रतिकूल रूप में बदल देना ज़्यादा मुश्किल नहीं होता I

दरअसल, जब वह मोदी को ‘ब्रांड’ की तरह बाजार में बेचना चाहते हैं, वह भी लगभग अवतार की तरह, तो उनके लिए सभी बदलने वाली संभावनाओं को कम करना जरूरी हो जाता है I मोदी के अति-आवेशपूर्ण दावों के दौरान, यह ‘हारा हुआ’ नेहरू कौन है जो 1962 में चीन को कड़ा सबक सिखाने में नाकाम रहा? दृढ़ इरादों वाले और ‘राष्ट्रवादी’ मोदी जो अयोध्या में शानदार मंदिर बनवाने के लिए दृढ़ है, के सामने यह ‘कुलीनवादी’ धर्मनिरपेक्ष नेहरू कौन है? फिर जब केदारनाथ में ध्यान (समाधि) लगाते हुए मोदी की बड़े स्तर पर प्रसारित हुई तस्वीर ज़्यादा दिलकश लगती है तो कोई वेदांत तथा नेहरू के गहरे विचारों के साथ जुड़ने का कष्ट क्यों करें? इसलिए कोई आश्चर्यजनक बात नहीं कि नेहरू को बुरा भला कहने वाली जनता ने अभी बढ़ना-फूलना है I 

वैसे, किसी ऐसे चौकन्ने दर्शक जिसने अभी बौद्धिकता की रोशनी ना गवाई हो, के लिए बढ़ती आत्म- प्रशंसा और इसके साथ संबंधित मानसिक असुरक्षा के दौरान ‘नेहरू से ईर्ष्या’ के मनोविज्ञान को देखना व समझना मुश्किल नहीं है I


अनुवाद                             

वंदना सुखीजा                     गुरबख्श सिंह मोंगा

असिस्टेंट प्रोफेसर, अंग्रेजी                एल-102 सुषमा जोयनेस्ट 

मीरी पीरी खालसा कॉलेज,             एयरपोर्ट रिंग रोड 

भदौड़ (बरनाला)                     ज़ीरकपुर

vandanasukheeja@gmail.com        मोहाली- 140603

मो. 9354221054